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उपन्यास >> कर्मभूमि (उपन्यास) कर्मभूमि (उपन्यास)प्रेमचन्द
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प्रेमचन्द्र का आधुनिक उपन्यास…
एक वार्डर दौड़कर कई कुरसियाँ लाया। सेठजी और जेल के दो अधिकारी बैठे। सेठजी ने पान निकालकर खाया, और इतनी देर में इस प्रश्न का जवाब भी सोचते जाते थे। तब प्रसन्न मुख होकर
बोले–‘नहीं, यह तो नहीं कहता। यह आलसियों और अकर्मण्यों का काम है। हमें प्रजा में जाग्रति और संस्कार उत्पन्न करने की चेष्टा करते रहना चाहिए। हमारी पूरी शक्ति जाति की आत्मा को जगाने में लगनी चाहिए। मैं इसे कभी नहीं मान सकता कि आज आधी मालगुजारी होते ही प्रजा सुख के शिखर पर पहुँच जायेगी। उसमें सामाजिक और मानसिक ऐसे कितने ही दोष हैं कि आधी तो क्या, पूरी मालगुजारी भी छोड़ दी जाय, तब भी उसकी दशा में कोई अन्तर न होगा। फिर मैं यह भी स्वीकार न करूँगा कि फरियाद करने की जो विधि सोची गयी और जिसका व्यवहार किया गया, उनके सिवा कोई दूसरी विधि न थी।’
अमर ने उत्तेजित होकर कहा–‘हमने अन्त तक हाथ-पाँव जोड़े, आख़िर मजबूत होकर हमें यह आन्दोलन शुरू करना पड़ा।’
लेकिन एक ही क्षण में वह नम्र होकर बोला–‘सम्भव है, हमसे गलती हो, लेकिन उस वक़्त हमें यही सूझ पड़ा।’
सेठजी ने शान्तिपूर्वक कहा–‘हाँ, गलती हुई और बहुत बड़ी गलती हुई। सैकड़ों घर बरबाद हो जाने के सिवा और कोई नतीजा न निकला। इस विषय पर गवर्नर साहब से नही लिया गया। तुम तो जानते हो, उनसे मेरी कितनी बेतक़ल्लुफ़ी है। नैना की मृत्यु पर उन्होंने मातमपुरसी का तार दिया था। तुम्हें शायद मालूम न हो, गवर्नर साहब ने खुद उस इलाके का दौरा किया और वहाँ के निवासियों से मिले। पहले तो कोई उनके पास आता ही न था। साहब बहुत हँस रहे थे कि ऐसी सूखी अकड़ नहीं देखी। देह पर साबित कपड़े नहीं, लेकिन मिज़ाज़ यह है कि हमें किसी से कुछ नहीं कहना है। बड़ी मुश्किल से थोड़े-से आदमी जमा हुए। जब साहब ने उन्हें तसल्ली दी और कहा–तुम लोग डरो मत, हम तुम्हारे साथ अन्याय नहीं करना चाहते। तब बेचारे रोने लगे। साहब इस झगड़े को जल्द तय कर देना चाहते हैं। और इसलिए उनकी आज्ञा है कि सारे कैदी छोड़ दिए जायें और एक कमेटी करके निश्चय कर लिया जाय कि हमें क्या करना है। उस कमेटी में तुम और तुम्हारे दोस्त मियाँ सलीम तो होंगे ही तीन आदमियों को चुनने का तुम्हें और अधिकार होगा। सरकार की ओर से केवल दो आदमी होंगे। बस, मैं यही सूचना देने आया हूँ। मुझे आशा है, तुम्हें इसमें कोई आपत्ति न होगा।’
सकीना और मुन्नी में कनफुसिकयाँ होने लगीं। सलीम के चेहरे पर भी रौनक़ आ गयी, पर अमर उसी तरह शान्त, विचारों में मग्न खड़ा रहा।
सलीम ने उत्सुकता से पूछा–‘हमें अख्तियार होगा, जिसे चाहें चुनें?’
‘पूरा।’
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