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कर्मभूमि (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :658
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8511

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प्रेमचन्द्र का आधुनिक उपन्यास…


‘उस कमेटी का फैसला नातिक़ होगा?’

सेठजी ने हिचकिचाकर कहा–‘मेरा तो ऐसा ही ख़याल है।’

‘हमें आपके ख़याल की ज़रूरत नहीं। हमें इसकी तहरीर मिलनी चाहिए।’

‘और तहरीर न मिले?’

‘तो हमें मुआइदा मंजूर नहीं।’

‘नतीजा यह होगा, कि यही पड़े रहोगे और रिआया तबाह होती रहेगी।’

‘जो कुछ भी हो।’

‘तुम्हें तो कोई खास तकलीफ नहीं है लेकिन गरीबों पर क्या बीत रही है, वह सोचो।

‘खूब सोच लिया हैं।’

‘नहीं सोचा।’

‘सोच लिया।’

‘बिलकुल नहीं सोचा।’

ख़ूब अच्छी तरह सोच लिया है।

‘सोचते तो ऐसा न कहते।’

‘सोचा है इसीलिए ऐसा कह रहा हूँ।’

अमर ने कठोर स्वर में कहा–‘क्या कह रहे हो सलीम! क्यों हुज्जत कर रहे हो? इसके फ़ायदा?’

सलीम ने तेज होकर कहा–‘मैं हुज्जत कर रहा हूँ? वाह री आपकी समझ! सेठजी मालदार हैं, हुक्कामरस है, इसलिए वह हुज्जत नहीं करते। मैं ग़रीब हूँ, इसलिए हुज्जत करना हूँ।’

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