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उपन्यास >> कर्मभूमि (उपन्यास) कर्मभूमि (उपन्यास)प्रेमचन्द
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प्रेमचन्द्र का आधुनिक उपन्यास…
‘सेठजी बुजुर्ग हैं।’
‘यह आज ही सुना कि हुज्जत करना बुजुर्गी की निशानी है।’
अमर अपनी हँसी को न रोक सका। बोला–‘यह शायरी नहीं है भाईजान, कि जो मुँह में आया बक गये। ऐसे मुआमले हैं, जिन पर लाखों आदमियों की ज़िन्दगी बनती-बिगड़ती है। पूज्य सेठजी ने इस समस्या को सुलझाने में हमारी मदद की है, जैसा उनका धर्म था! और इसके लिए हमें उनका मशकूर होना चाहिए। हम इसके सिवा और क्या चाहते हैं कि ग़रीब किसानों के साथ इन्साफ किया जाये, और जब इस उद्देश्य को करने के इरादे से एक ऐसी कमेटी बनाई जा रही है, जिससे यह आशा नहीं की जा सकती कि वह किसान के साथ अभ्यास करे, तो हमारा धर्म है कि उसका स्वागत करें।’
सेठजी ने मुग्ध होकर कहा–‘कितनी सुन्दर विवेचना है। वाह! लाट साहब ने ख़ुद तुम्हारी तारीफ़ की।’
जेल के द्वार पर मोटर का हार्न सुनाई दिया। जेलर ने कहा–‘लीजिए, सेवियों के लिए मोटर आ गयी। आइए, हम लोग चलें। देवियों को अपनी-अपनी तैयारियाँ करने दें। बहनों, मुझसे जो कुछ ख़ता हुई हो, उसे मुआफ कीजिएगा। मेरी नीयत आपकों तकलीफ़ देने की न थी, हाँ सरकारी नियमों से मज़बूर था।’
सब के सब एक ही लारी में जायें, यह तय हुआ। रेणुका देवी का आग्रह था। महिलाएँ अपनी तैयारियाँ करने लगीं। अमर और सलीम के कपड़े भी यहीं मँगवा लिये गये। आधे घण्टे में सब के सब जेल से निकले।
सहसा एक दूसरी मोटर आ पहुँची और उस पर से लाला समरकान्त हाफ़िज हलीम, डॉ. शान्तिकुमार और स्वामी आत्मानन्द उतर पड़े। अमर दौड़कर पिता के चरणों पर गिर पड़ा। पिता के प्रति आज उसके हृदय में असीम श्रद्धा थी। नैना मानो आँखों में आँसू भरे उससे कह रही थी–‘भैया दादा को कभी दुःखी न करना, उनकी रीति-नीति तुम्हें बुरी भी लगे, तो भी मुँह मत खोलना। वह उनके चरणों को आँसुओं से धो रहा था और सेठजी उसके ऊपर मोतियों की वर्षा कर रहे थे।’
सलीम भी पिता के गले से लिपट गया। हाफिज़जी ने आशीर्वाद देकर कहा–‘खुदा का लाख-लाख शुक्र हैं कि तुम्हारी कुरबानियाँ सुफर हुई। कहाँ है सकीना, उसे भी देखकर कलेजा ठण्डा कर लूँ।’
सकीना सिर झुकाये आयी और उन्हें सलाम करके खड़ी हो गयी। हाफ़िज़जी ने उसे एक नज़र देखकर समरकान्त से कहा–‘सलीम का इन्तिख़ाब तो बुरा नहीं मालूम होता।’
समरकान्त मुस्कराकर बोले–‘सूरत के साथ दहेज में देवियों के जौहर भी है।’
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