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उपन्यास >> कर्मभूमि (उपन्यास) कर्मभूमि (उपन्यास)प्रेमचन्द
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प्रेमचन्द्र का आधुनिक उपन्यास…
आनन्द के अवसर पर हम अपने दुःखों को भूल जाते हैं। हाफ़िज़जी को सलीम के सिविल सर्विस से अलग होने का, समरकान्त को नैना की मृत्यु का और सेठ धनीराम को पुत्र-शोक का रंज कुछ कम न था, पर इस समय सभी प्रसन्न थे। किसी संग्राम में विजय पाने के बाद योद्धागण मरने वालों के नाम को रोने नहीं बैठते। उस वक़्त तो सभी उत्सव मनाते हैं, शादियाने बजते हैं, महफिलें जमती हैं, बधाइयाँ दी जाती हैं। रोने के लिए हम एकान्त ढूँढते हैं, हँसने के लिए अनेकान्त।
सब प्रसन्न थे। केवल अमरकान्त मन मारे हुए उदास था।
सब लोग स्टेशन पर पहुँचे, तो सुखदा ने उससे पूछा– ‘तुम उदास क्यों हो?’
अमर ने जैसे जागकर कहा–‘मैं! उदास तो नहीं हूँ।’
‘उदासी भी कहीं छिपाने से छिपती हैं?’
अमर ने गम्भीर स्वर में कहा–‘उदास नहीं हूँ, केवल यह सोच रहा हूँ कि मेरे हाथों इतनी जान-माल की क्षति अकारण ही हुई। जिस नीति से अब काम लिया गया। क्या उसी नीति से तब काम न लिया जा सकता था? उस ज़िम्मेदारी का भार मुझे दबाये डालता है।’
सुखदा ने शान्त कोमल स्वर में कहा–‘मैं तो समझती हूँ, जो कुछ हुआ, अच्छा ही हुआ। जो काम अच्छी नीयत से किया जाता है, वह ईश्वरार्थ होता है। नतीजा कुछ भी हो, यज्ञ का अगर कुछ फल न मिले तो यज्ञ का पुण्य तो मिलता ही है। लेकिन मैं तो इस निर्णय को विजय समझती हूँ, ऐसी विजय जो अभूतपूर्व है। हमें जो कुछ बलिदान करना पड़ा, समझते हो, इन बलिदानों के बिना यह जाग्रति आ सकती थी, और क्या इस जाग्रति के बिना यह समझौता हो सकता था? मुझे तो इसमे ईश्वर का हाथ साफ़ नज़र आ रहा है।’
अमर ने श्रद्धा–भरी आँखों से सुखदा को देखा। उसे ऐसा जान पड़ा कि स्वयं ईश्वर इसके मन में बैठे बोल रहे हैं। वह क्षोभ और ग्लानि निष्ठा के रूप में प्रज्वलित हो उठी, जैसे कूड़े-करवट का ढेर आग की चिनगारी पड़ते ही तेज और प्रकाश की राशि बन जाता है। ऐसी प्रकाशमय शान्ति उसे कभी न मिली थी।
उसने प्रेम–गदगद कण्ठ से कहा–‘सुखदा, तुम वास्तव में मेरे जीवन का दीपक हो।’
उसी वक़्त लाला समरकान्त बालक को कन्धे पर बिठाये हुए आकर बोले–‘अभी तो काशी ही चलने का विचार है न?’
अमर ने कहा–‘मुझे तो अभी हरिद्वार जाना है।’
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