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उपन्यास >> कर्मभूमि (उपन्यास) कर्मभूमि (उपन्यास)प्रेमचन्द
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प्रेमचन्द्र का आधुनिक उपन्यास…
सुखदा बोली–‘तो हम सब वहीं चलेंगे।’
अमरकान्त ने कुछ हताश होकर कहा–‘अच्छी बात है। तो ज़रा मैं बाज़ार से सलोनी के लिए साड़ियाँ लेता आऊँ।’
सुखदा ने मुस्कराकर कहा–‘सलोनी ही के लिए क्यों? मुन्नी भी तो हैं।’
मुन्नी इधर ही आ रही थी। अपना नाम सुनकर जिज्ञासा–भाव से बोली–‘क्या मुझे कुछ कहती हो बहूजी?’
सुखदा ने उसकी गरदन में हाथ डालकर कहा–‘मैं कह रही थी कि अब मुन्नी देवी भी हमारे साथ काशी रहेंगी!’
मुन्नी ने चौंककर कहा–‘तो क्या तुम लोग काशी जा रहे हो?’
सुखदा हँसी–‘और तुमने क्या समझा था?’
‘मैं तो अपने गाँव जाऊँगी।’
‘हमारे साथ न रहोगी?’
‘तो क्या लाला भी काशी जा रहे हैं?’
‘और क्या। तुम्हारी क्या इच्छा है?’
मुन्नी का मुँह लटक गया।
‘कुछ नहीं, यों ही पूछती थी।’
अमर ने उसे आश्वासन दिया–‘नहीं मुन्नी, यह तुम्हें चिढ़ा रही हैं। हम सब हरिद्वार चल रहे हैं।’
मुन्नी खिल उठी।
‘तब तो बड़ा आनन्द आयेगा। सलोनी काकी मूसलों ढोल बजायेगी।’
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