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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
चक्रधर–अब तक जितनी चिन्ताएँ हैं, उनमें तो तुम्हारी नींद का यह हाल है, यह चिन्ता और हुई, तो शायद तुम्हारी कभी आँख ही न खुलें।
अहिल्या–क्या मैं सचमुच बहुत सोती हूँ?
चक्रधर–अच्छा, अभी तुम्हें इसमें संदेह भी है! घड़ी देखो! आठ बज गए हैं। तुम पाँच बजे उठकर घर का धंधा करने लगती थीं।
अहिल्या–तब की बातें जाने दो। अब उतने सबेरे उठने की ज़रूरत क्या है?
चक्रधर–तो क्या तुम उम्र-भर यहाँ मेहमानी खाओगी?
अहिल्या ने विस्मित होकर कहा–इसका क्या मतलब?
चक्रधर–इसका मतलब यही है कि हमें यहाँ आए हुए बहुत दिन गुज़र गए। अब अपने घर चलना चाहिए।
अहिल्या–अपना घर कहाँ है?
चक्रधर–अपना घर वही है, जहाँ अपने हाथों की कमाई है।
अहिल्या ने एक मिनट सोचकर कहा–लल्लू कहाँ रहेगा?
चक्रधर–लल्लू को यहीं छोड़ सकती हो। वह रानी मनोरमा से खूब हिल गया है। तुम्हारी शायद उसे याद भी न आए।
अहिल्या–अच्छा तो अब समझ में आया। इसीलिए रानीजी उससे इतना प्रेम करती हैं। यह बात तुमने स्वयं सोची है, या रानीजी ने कुछ कहा है?
चक्रधर–भला, वह क्या कहेंगी? मैं खुद यहाँ रहना नहीं चाहता। ससुराल की रोटियाँ बहुत खा चुका। खाने में तो वह बहुत मीठी मालूम होती हैं; पर उनसे बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। औरों को हज्म होती होंगी; पर मुझे तो नहीं पचतीं, और शायद तुम्हें भी नहीं पचतीं। इतने ही दिनों में हम दोनों कुछ के कुछ हो गए। यहाँ कुछ दिन और रहा, तो कम-से-कम मैं तो कहीं का न रहूँगा। कल मैंने एक ग़रीब किसान को मारते-मारते अधमुआ कर दिया। उसका कसूर केवल यह था कि वह मेरे साथ आने पर राज़ी न होता था।
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