कहानी संग्रह >> प्रेम पचीसी (कहानी-संग्रह) प्रेम पचीसी (कहानी-संग्रह)प्रेमचन्द
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मुंशी प्रेमचन्द की पच्चीस प्रसिद्ध कहानियाँ
बुढ़िया–आप बहुत देंगे, सौ पचास रुपये देंगे इतने में हम कै दिन खायेंगे। मूठ फेरना साँप के बिल में हाथ डालना है, आग में कूदना है। भगवान की ऐसी ही निगाह हो तो जान बचती है।
डाक्टर–तो माता जी मैं तुमसे बाहर तो नहीं होता हूँ। जो कुछ तुम्हारी मर्जी हो वह कहो। मुझे तो उस गरीब की जान बचानी है। यहाँ बातों में देर हो रही है, वहाँ मालूम नहीं उसका क्या हाल होगा।
बुढ़िया–देर तो आप कर रहे हैं, आप बात पक्की कर दें तो यह आपके साथ चला जाय। आपकी खातिर यह जोखिम अपने सिर ले रही हूँ दूसरा होता तो झट इनकार कर जाती। आपके मुलाहजे में पड़ कर जानबूझ कर जहर पी रही हूँ।
डाक्टर साहब को एक क्षण एक वर्ष जान पड़ रहा था। बुद्धू को उसी समय अपने साथ ले जाना चाहते थे। कहीं उसका दम निकल गया तो यह जा कर क्या बनायेगा। उस समय उनकी आँखों में रुपये का कोई मूल्य न था। केवल यही चिन्ता थी कि जगिया मौत के मुँह से बाहर निकल आये। जिस रुपये पर वह अपनी आवश्यकताएँ और घरवालों की आकांक्षाएँ निछावर करते उसे दया के आवेश में बिलकुल तुच्छ बना दिया था। बोले–तुम्हीं बतलाओ, अब मैं क्या कहूँ, पर जो कुछ कहना हो झटपट कह दो।
बुढ़िया–अच्छा तो पाँच सौ रुपये दीजिए इससे कम में काम न होगा।
बुद्धू ने माँ की ओर आश्चर्य से देखा, और डाक्टर साहब मूर्छित–से हो गये, निराशा से बोले–इतना मेरे बूते के बाहर है, जान पड़ता है इसके भाग्य में मरना ही बदा है।
बुढ़िया–तो जाने दीजिए, हमें अपनी जान भार थोड़े ही है। हमने तो आपके मुलाहिजे से इस काम का बीड़ा उठाया था जाओ बुद्धू सोओ।
डाक्टर–बूढ़ी माता इतनी निर्दयता न करो, आदमी का काम आदमी से निकलता है।
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