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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘वास्तव में देवलोक के इस नियम का उल्लंघन इसकी माँ ने किया है। उसने इसको राज्याधीन नहीं किया और स्वयं ही इसका पालन-पोषण करती रही है। उसने ही इसको बताया है कि इसके एक पिता हैं और तब से यह अपने पिता को स्मरण करती रही है। साथ ही मानव-वीर्य से उत्पन्न होने से यह देव-कन्याओं से विलक्षण होती जा रही है।’’

‘‘मैं इसको अपने साथ ले जाने के लिए तैयार हूँ।’’

‘‘परन्तु मानव-सन्तान होने से यह अपनी माँ से भी अति स्नेह करती है। उसके बिना यह जायेगी नहीं।’’

‘‘तो ठीक है। आप इसकी माँ को भी साथ भेज दीजिये।’’

‘‘परन्तु उर्मिला जाना नहीं चाहती। न ही हम देवलोक की किसी स्त्री को देवलोक से बाहर अधिक काल के लिए रहने की स्वीकृति दे सकते हैं। यह यहाँ का नियम है।’’

‘‘तो फिर क्या किया जा सकता है?’’

‘‘हमने आपको यहाँ बुलाया है, जिससे आप यहाँ रहने लग जायें। हस्तिनापुर में अब आपकी आवश्यकता नहीं रही। धृतराष्ट्र और पांडु, दोनों के सन्तान हो चुकी हैं। पांडु और उनकी सन्तान शतश्रृंग पर्वत पर रहती हैं। धृतराष्ट्र का बड़ा लड़का दुर्योधन अब सात वर्ष का हो गया है और उसके लिए एक गुरु ढूँढ़ा जा चुका है। अब आपकी वहाँ किसी को भी आवश्यकता नहीं। यहाँ उर्मिला आपकी जीवन-भर पत्नी रहेगी। आप देवांगनाओं के चित्र बनाइये और आनन्द से रहिये।’’

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