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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘मुझको यहाँ रहना रुचिकर नहीं है महाराज! मेरी चंचल प्रकृति यहाँ के एक-रस जीवन में उदास हो जायेगी।’’
‘‘क्या ये चित्र बनाने पर्याप्त कार्य नहीं आपके चित्त को स्थिर करने के लिए?’’
‘‘जी नहीं। चित्र बनाने से अधिक लोक-सेवा नहीं होती, जितनी संसार के सँघर्ष में न्याय-पक्ष की ओर से भाग लेने से होती है।’’
‘‘परन्तु संजयजी! भारत का भाग्य तो निश्चित हो चुका है। एक महान् शक्ति, जो भारत में व्याप्त हो रही अनैतिकता का समूल नाश करने के लिए तैयार की गई है, वहाँ जन्म ले चुकी है। उसके साथ सहयोग करने के लिए पाँच देव-सन्तानों का भी भारत में उद्भव हो चुका है। वहाँ पर खेले जाने वाले नाटक को रोकना चाहें तो भी आप रोक नहीं सकेंगे।’’
‘‘महाराज! मुझको हस्तिनापुर से आये नौ वर्ष से ऊपर हो चुके हैं। इस काल में वहाँ क्या हुआ है, मैं नहीं जानता। इस कारण भी मैं समझता हूँ कि मेरा वहाँ जाना आवश्यक है।’’
‘‘परन्तु यह उचित नहीं होगा। वे लोग इतने अभिमानी हैं कि किसी भी भले पुरुष की भली सम्मति को ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं होते। आपका वहाँ जाना व्यर्थ है। हाँ, आप एक बात कर सकते हैं। हस्तिनापुर जाने के स्थान आप वृन्दावन चले जायें। वहाँ आप एक महान् शक्ति का प्रादुर्भाव देखेंगे। जाइए, उसके अनुचर बन कार्य करिए। इससे आपका भी कल्याण होगा, भारत का भी कल्याण होगा। इससे जो योजना श्रुतिवाद के पुनः स्थापना के लिए हमने बनाई है, उसमें गति और तीव्र हो जायेगी।’’
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