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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘महाराज? मैं भारत में तो जा ही रहा हूँ। आपकी सम्मति के अनुसार वृन्दावन में देवताओं की भेजी हुई महान् शक्ति के दर्शन भी करूँगा और यदि मेरे द्वारा कुछ कल्याण कार्य हो सका तो अवश्य करूँगा।’’
‘‘पर इस उर्मिला की लड़की लोमा का क्या करेंगे?’’
‘‘मैं यहाँ देवलोक में रह नहीं सकता। यह लड़की मेरे साथ चल सकती है। मैं इसको जन्म देने वाला हूँ और इसका पालन-पोषण मेरा कर्त्तव्य है यदि उर्मिला मेरी पत्नी बनकर मेरे साथ चलकर रहना चाहे तो रह सकती है। लड़की भी हमारे साथ रहेगी।’’
इस पर उर्मिला ने कह दिया, ‘‘मैं तो देवलोक में ही रहना चाहती हूँ। परन्तु यहाँ पर नियम है कि सबको अपनी सन्तान राज्य को सौंप देनी चाहिए। मैं यह करना नहीं चाहती। इस कारण नहीं जानती कि क्या करूँ।’’
‘‘देवेन्द्र! आप ही कुछ सुझाव दीजिए।’’
‘‘मैं सुझाव तो दे चुका हूँ। आप देवलोक में रहकर यहाँ की अद्वितीय वस्तुओं के चित्र खींचिये।’’
‘‘मुझको ऐसा निर्रथक जीवन पसन्द नहीं है।’’
‘‘यह निरर्थक कैसे हो गया? आप प्रकृति के बनाये सौन्दर्य को स्थायी और स्थिर रूप देकर युग-युग में होने वालों के आनन्द और सुख के लिए कल्याणकारक बने रहेंगे। कला कलाकार को तो प्रसन्न करती ही है, साथ ही कलाकृति को देखने और सुनने तथा अनुभव करने वाले के दुःख, क्लेश और शोक का हरण करती है। यह कार्य आप निरर्थक समझते हैं?’’
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