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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘अर्थ और अर्थहीन सामयिक तथा स्थानीय अर्थ रखते हैं। एक परिस्थिति में एक वस्तु अर्थयुक्त होती है और दूसरी परिस्थिति में वही वस्तु अर्थहीन हो जाती है। देवलोक के रहने वाले के अर्थहीन जीवनों में रोचकता अथवा सरसता उत्पन्न करना भी निरर्थक कहा जायेगा। देवाधिदेव! मैं यदि हस्तिनापुर राज्य की सेवा से मुक्त हो गया तो किसी एक ग्राम में जाकर रहूँगा और अपने चित्रों से वहाँ के ग्रामीण को दिन-भर के परिश्रम के पश्चात्, यथाशक्ति सुख पहुँचाकर अपना जीवन सार्थक करूँगा।’’
सुरराज इस पर हँस पड़े। मैं इसका अर्थ नहीं समझा और विस्मित उनके मुख की ओर देखने लगा। इन्द्र ने कहा, ‘‘तो संजयजी महाराज की कला का रसास्वादन करने के लिए देवताओं को दिन-भर परिश्रम करना चाहिए। उस परिश्रम से रूखी-सूखी रोटी खाते हुए कला का रसास्वादन करना चाहिए। यही अर्थ है न? पहले जीवन को दुखमय बनाया जाये, जिससे कला का रसास्वादन किया जा सके।’’
‘‘मैंने यह नहीं कहा महाराज! मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि जब कोई व्यक्ति थक जाता है, तो उसको विश्राम की आवश्यकता होती है। जिसको थकावट नहीं होती, उसको कोमल गद्दे भी चुभने लगते हैं। कला का उद्देश्य तो अक्लान्त व्यक्ति को सुख पहुँचाना है, न कि सुखी को दुःखी करना।’’
मैं कई दिन तक देवलोक में रहा और उर्मिला मेरे वहीं रह जाने के लिए आग्रह करती रही। जब मैं नहीं माना तो यह निर्णय हुआ कि लोमा मेरे साथ जायेगी और कभी-कभी मैं उसको देवलोक में लाकर उसको उसकी माँ से मिला जाया करूँगा।
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