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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।

2

हस्तिनापुर से, राजकुमार पांडु के विवाह के उपरान्त ही मैं चला आया था। इस बार एक बात अवश्य हुई कि हस्तिनापुर से अनुपस्थित रहने पर भी मेरा वेतन नियमित रूप में मिलता रहा था। मैं यह समझा था कि दोनों कुमारों के विवाह में सहयोग के उपलक्ष्य में राज-माता की प्रसन्नता का यह सूचक है। एक बड़ा कारण यह भी था कि सुरराज के प्रलोभनों पर भी मैं हस्तिनापुर की सेवा छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ था।

उर्मिला की लड़की लोमा को साथ ले, उसको पिताजी के पास आश्रम में ही छोड़ मैं हस्तिनापुर जा पहुँचा। वहाँ आकर मुझे पता चला कि सुरराज का कथन सत्य है। दुर्योधन आदि कुमारों की शिक्षा के लिए द्रोणाचार्य नाम के एक ब्राह्मण को नियुक्त कर लिया गया था। उनकी शिक्षा से सिवाय महारानी अम्बिका के अन्य सब प्रसन्न थे। राजमाता तो उससे बहुत ही सन्तुष्ट थीं।

धृतराष्ट्र की पत्नी गान्धारी दिन-रात अपनी आँखों पर पट्टी बाँधे अपने आपको कृत्रिम रूप में अन्धी बनाकर अपने पति के समान रहती थी। सबसे अधिक चमत्कारपूर्ण बात जो मैंने वहाँ पहुँचकर सुनी, यह थी गान्धारी के अभी तक चौरासी पुत्रों का जन्म हो चुकना। जिस भृत्य ने मुझे इसकी सूचना दी थी, उसको मैंने पागल समझ ये बातें मस्तिष्क में से निकाल दी थीं। परन्तु जब मैं भीष्मजी से मिलने लगा तो उन्होंने इसका रहस्य बताया।

भीष्मजी मुझको देख अत्यन्त प्रसन्न हुए और कहने लगे, ‘‘संजय जी! आप आ गये हैं, यह बहुत अच्छा हुआ।’’

मैंने अपनी पत्नी के रुग्ण रहने तथा देहान्त हो जाने का समाचार दिया तो उन्होंने शोक प्रकट करते हुए बच्चों के विषय में पूछा। मैंने बताया कि वे मेरे पिताजी के पास आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। आगे उन्होंने पूछा, ‘‘अब आप और विवाह करेंगे?’’

‘‘अभी तो इच्छा नहीं। इस पर भी मैं अभी वानप्रस्थ नहीं ले रहा।’’

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