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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘यह व्यर्थ है। मेरी सम्मति है कि आप यहाँ रहिये। धृतराष्ट्र को अभी भी एक संरक्षक की आवश्यकता है और आपकी संगत में रहकर बहुत प्रसन्न होगा।’’

‘‘महाराज! अभी तक मैं इस राज्य से वेतन पाता रहा हूँ, इसी कारण आपके पास किसी काम पर नियुक्त किये जाने की प्रार्थना लेकर आया हूँ।’’

‘‘हम तो इसके वेतन नहीं समझते। राजमाता आपसे बहुत प्रसन्न हैं और इस कारण यह निर्वाह के लिए आपको उसी प्रकार मिल रहा है, जिस प्रकार मुझको मिलता है।’’

‘‘महाराज! धृतराष्ट्र का बड़ा पुत्र कितनी आयु का है?’’

मेरे प्रश्न को सुन भीष्मजी हँस पड़े। मुझको अपने भृत्य का कथन। कि महारानी गान्धारी के चौरासी पुत्र हो चुके हैं, स्मरण हो आया इसी कारण मैं विस्मय में भीष्मजी के मुख की ओर देख रहा था। उन्होंने हँसकर कहा, ‘‘संजयजी! राजमाता सत्यवती का परिवार अब बहुत बड़ा हो गया है। जानते हैं उनके पौत्रों की संख्या कितनी है?’’

‘‘कितनी है महाराज?’’

‘‘इस समय चौरासी है। प्रतिमास एक पुत्र और उत्पन्न हो जाता है।’’

‘‘सत्य महाराज! यह कैसे सम्भव है?’’

‘‘धृतराष्ट्र का विवाह हुए दो वर्ष व्यतीत हो चुके थे और उसके कोई सन्तान नहीं हुई। इससे राजमाता को चिन्ता लगने लगी। दूसरी ओर पांडु की पत्नी पृथा से एक पुत्र उत्पन्न हो गया। इससे राजमाता ने अपने ज्येष्ठ पुत्र कृष्ण द्वैपायनजी को बुला भेजा। वे आये तो राज-माता ने गान्धारी को उनकी सेवा-शुश्रूषा के लिए भेजा। राजमाता का उसको भेजने का क्या अर्थ था, यह तो पता नहीं चला, परन्तु कृष्ण द्वैपायन गान्धारी से प्रसन्न हो, कहने लगे, ‘वर माँगो बेटी! जो इच्छा हो माँगो। मैं अपने योगबल से तुम्हारी कामना पूर्ण करूँगा।’’

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