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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘गान्धारी ने न जाने क्या विचारकर कहा, ‘महाराज! यदि आप कर सकते हैं, तो ऐसा करिये कि मेरे सौ पुत्र हों।’’

‘‘कृष्ण द्वैपायन इससे गम्भीर सोच में पड़ गये। तत्पश्चात् उन्होंने इसी विद्या के विशेषज्ञ देवता से बातचीत कर एक योजना बनाई। यह देवता बिना सम्भोग-क्रिया के स्त्रियों में गर्भ ठहराता है। उसने गान्धारी के विषय में भी आयोजना किया। उसके ऋतुकाल के पश्चात् वह उसके गर्भाशय से बने हुए अंड को एक यत्न से निकालकर एक मिट्टी के पात्र में, जिसमें घी भरा होता है, रखकर उसमें धृतराष्ट्र के वीर्य से बीज-कीटाणु छोड़ देता है। लगभग नौ मास के उपरान्त उस घड़े में एक बालक बन जाता है। वह देवता स्वयं आकर उस बालक को निकालता है और धो-पोंछकर धाय के पास दे जाता है। वह पिछले और माँ के पेट के बाहर बच्चे के बनने और पलकर पूर्ण होने का प्रबन्ध कर जाता है। अभी तक चौरासी हो चुके हैं। राजमाता इससे बहुत प्रसन्न है और उस देवता को प्रतिमास एक सहस्त्र स्वर्ण मुद्रा उसकी सेवा के उपलक्ष्य में देती है।’’

‘‘महाराजा! यह तो एक अति आश्चर्यकारक, परन्तु प्रसन्नता की बात है। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र होंगे। ये सब धृतरराष्ट्र की आँखें, कान और बाँहें होंगी। धृतराष्ट्र एक अति बलशाली सम्राट बन जायेगा।’’

‘‘हाँ, मैं समझता हूँ कि इतने सबल, स्वस्थ और योग्य पुत्र रखने वाला तो पूर्ण पृथ्वी पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लेगा। राजमाता की प्रसन्नता का यही एक कारण है। वे समझती हैं कि अन्त में उनकी योजना कि कौरव-राज्य उनकी सन्तान के लिए सुरक्षित रहे, सफल हुई है।’’

‘‘महाराज! पांडुकुमार का क्या हाल है?’’

‘‘वह शतश्रृंग पर्वत पर आश्रम बनाकर अपनी तपस्या में लीन हैं। उसके साथ दुर्घटना हो गई है और वह संसार से विरक्त हो गया प्रतीत होता है।’’

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