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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
मैं शान्त हो भीष्मजी के आगे कहने की प्रतीक्षा करता रहा। वे कुछ काल तक विचारकर बोले, ‘‘संजयजी! आप तो परिवार की सब बातें जानते हैं। आपको बताने में हानि नहीं हो सकती। एक दिन पांडु मृगया कर रहा था। उसको दूर एक हिरण हिरणी का भोग करता दिखाई दिया। वह अपने शर-संधान में लीन था। उसने तीर चलाया तो तीर दीख रहे हिरण को जा लगा। हिरण मनुष्य की भाँति कराहने लगा। इससे पांडु घबराया और समीप जाकर देख अत्यन्त दुखी हुआ कि विषय-भोग करने वाले एक ऋषि और उनकी पत्नी थी। उन्होंने मृगछाला से अपने आपको ढँका हुआ था। पांडु ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए क्षमा माँगी। उसने कहा, ‘‘ऋषिराज! मैंने तो मृग समझ कर ही बाण चलाया था।’’
ऋषि अतृप्त अवस्था में ही प्राण त्याग रहा था। अतः उसने पांडु को शाप देते हुए कहा, ‘‘तुमने मृग समझ ही बाण चलाया तो कोई पाप नहीं किया, परन्तु मृग को मैथुन करते हुए मारना तो किसी प्रकार भी क्षम्य नहीं। अतः मैं तुमको शाप देता हूँ कि तुम जब भी अपनी पत्नी से मैथुन करोगे तो तड़प-तड़पकर मर जाओगे।’’
ऋषि का तो प्राणान्त हो गया। ऋषि-पत्नी उसके साथ ही सती हो गई। तब से पांडु ने अपनी पत्नियों को त्याग दिया है। इस पर भी पांडु की तथा उसकी पत्नियों की इच्छा थी कि उनके सन्तान हो। इस पर पांडु ने अपनी पत्नियों को नियोग की स्वीकृति दे दी। इस प्रकार पृथा, जो कुन्ती के नाम से विख्यात है, के तीन पुत्र हुए हैं और उसकी दूसरी पत्नी माद्री के दो सन्तानें हुई हैं। वह अभी भी अपनी पत्नियों और पुत्रों के साथ शतश्रृंग पर्वत पर ब्रह्मचर्य का पालन करता हुआ रह रहा है।’’
मैंने चिन्ता प्रकट करते हुए कहा, ‘‘महाराज! आप नियोग का नाम लेकर शास्त्राज्ञा का उल्लंघन कर रहे हैं। यह नियोग कैसे हो गया? कुन्ती ने तीन बार पर-पुरुष से समागम किया। शास्त्र में तो एक सन्तान हो जाने पर पुनः नियोग की स्वीकृति नहीं दी गई।’’
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