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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘संजयजी! मनु महाराज ने तो सतयुग के काल की बात लिखी है। आज संसार वैसा धर्मात्मा नहीं है। इस कारण प्रत्येक धर्म-व्यवस्था में कुछ ढील हो जाना स्वाभाविक है।’’
‘‘तो महाराज इसका नाम नियोग न रखकर कुछ अन्य नाम की व्यवस्था कर दीजिए।’’
‘‘नियोग भी अच्छा नाम है, परन्तु मैं तो कुछ अन्य ही बात कह रहा हूँ। पांडु का पुत्र युधिष्ठिर दुर्योधन से बड़ा है और मैंने व्यवस्था दे रखी है कि राज्य का उत्तराधिकारी धृतराष्ट्र और पाँडु की सन्तान में बड़ा लड़का होगा। इसका अर्थ यह है कि युधिष्ठिर युवराज बनेगा, परन्तु राजमाता दुर्धोधन को युवराज बनाना चाहती है।’’
‘‘उनको धृतराष्ट्र से इतना मोह क्यों है? उनके लिए ये दोनों–धृतराष्ट्र और पांडु समान होने चाहिएँ और उनकी सन्तानों में भी भेदभाव नहीं करना चाहिए।’’
‘‘आप ठीक कहते हैं संजयजी! परन्तु ‘त्रिया-हठ’ तो आप जानते ही हैं। मेरी इच्छा थी कि पांडु के पुत्रों को यहाँ ले आऊँ और उनकी शिक्षा-दीक्षा राजा के पुत्रों की भाँति करवाऊँ, परन्तु राजमाता नहीं मान रहीं।’’
अब मैंने बात बदलकर तीसरे पुत्र विदुर के विषय में पूछ लिया। उसके विषय में भीष्मजी ने बताया, विदुर का भी विवाह हो गया है। महाराज देवक की शूद्र दासी से एक कन्या थी। उससे उसका विवाह कर दिया है। अब उसके घर में भी तीन पुत्र हैं।’’
‘‘तो कुरु-वंश अब एक बहुत बड़ा वंश बन गया है। यह सौभाग्य की ही बात माननी चाहिए।’’
भीष्मजी से मिलने के पश्चात् मैं राजमाता के दर्शनों के लिए गया। उन्होंने भी मुझसे मिलकर प्रसन्नता प्रकट की और मुझे धृतराष्ट्र के साथ उसका संरक्षक बनकर रहने का आदेश दे दिया।
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