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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।

3

हस्तिनापुर में आये अभी मुझे एक सप्ताह ही हुआ था कि राज-परिवार की परिवर्तित स्थिति का मुझे ज्ञान हो गया। गान्धारी का भाई शकुनि अब हस्तिनापुर में एक गृह लेकर निवास कर रहा था। उसने अपने बहुत-से मित्र तथा सेवक वहाँ एकत्र किये हुए थे और वह गान्धारी तथा दुर्योधन पर अपना प्रभुत्व स्थिर रखे हुए था।

दुर्योधन आदि भाइयों की शिक्षा के लिए द्रोणाचार्य की नियुक्ति भी शकुनि की सम्मति से की गई थी और द्रोणाचार्य दुपद राज्य से बहिष्कृत हो वहाँ आया था। यों तो द्रपद उसका सहपाठी था। शिक्षा के पश्चात् जब द्रोणाचार्य जीवनयापन के लिए कोई कार्य नहीं कर सका और उसके बच्चे भूख से व्याकुल रहने लगे तो वह अपने मित्र राजा द्रुपद के पास सेवा-कार्य के लिए जा पहुँचा। परन्तु राजा द्रुपद ने उसको कार्य नहीं दिया। इससे वह उससे रुष्ट होकर हस्तिनापुर चला आया। यहाँ शकुनि से उसकी भेंट हुई और वह उसकी योग्यता का अनुमान लगा, उसको गान्धारी के पास ले गया। गान्धारी के कहने पर द्रोणाचार्य को दुर्योधन आदि भाइयों की शिक्षा के लिए रख लिया गया।

द्रोणाचार्य गान्धारी और धृतराष्ट्र का कृतज्ञ था। उसके कारण ही उसको एक महान् राज्य के राजकुमारों का गुरु बनने और धन-धान्य से सन्तुष्ट किये जाने का अवसर मिला था।

प्रायः जब मैं राजभवन में जाता तो द्रोणाचार्य से मेरी भेंट हो जाती। मैं धर्मशास्त्र तथा राजनीति की शिक्षा देता था और द्रोणाचार्य धनुर्विधा का ज्ञाता था और इसकी शिक्षा देता था। इसके साथ ही हम दोनों की प्रकृति भी भिन्न-भिन्न थी। जब किसी विषय पर सम्मति ली जाती, हम दोनों प्रायः भिन्न सम्मति देते थे।

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