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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


मैंने कहा, ‘‘महाराज! आपके परिवार में विलक्षणता तो है ही। मैं समझता हूँ कि वह विलक्षणता किसी दिन भयंकर परिणाम भी उत्पन्न कर सकती है।’’

‘‘देखिए महाराज! कुछ मास हुए मैं देवलोक में था। वहाँ सुरराज से मेरी भारत में आपके राज्य के विषय में बातचीत हुई थी। सुरराज तो यह समझते हैं कि आपके परिवार में यह अन्यायाचरण न केवल परस्पर व्यवहार में ही देखा जा रहा है, प्रत्युत इससे आपके राज्य में भले और श्रेष्ठ प्रजागणों को भी कष्ट है। वे अनुभव कर रहे थे कि धर्माचरण से जीवन चल नहीं सकता। जहाँ लोग यह अनुभव करें कि जब राज्य में धन-धान्य तो है, परन्तु मिलता है उसको जो अधर्माचरण करने वाले हैं, तब राज्य का नाश अवश्यंभावी है।’’

धृतराष्ट्र ने चिन्ता प्रकट करते हुए कहा, ‘‘परन्तु यह कार्य तो भीष्मजी का है। आप उनसे मिलने जाते हैं तो उनको कहते क्यों नहीं?’’

‘‘महाराज! यह मेरा स्वाभाव है कि बिना पूछे अपनी सम्पति नहीं देता। मैं आपको एक ब्राह्मण-परिवार की कथा बताता हूँ। इसी नगर में एक वीरभद्र नाम के ब्राह्मण रहते थे। वे वेद-वेदांगों के विद्वान् और देववाणी के धुरन्धंर वक्ता थे। भीष्मजी के पिता के काल में इस राज्य में क्षत्रियों से ब्राह्मणों को मान्यता प्राप्त थी। परन्तु जब राज्य में स्वर्ण और मुक्तादि के अम्बार लग गये और धन-धान्य से यह राज्य परिपूर्ण हो गया तो धन एकत्र करने वाले उच्छृंखल होने लगे। क्षत्रियों को वेदादि के पढ़ने में सार दिखाई नहीं दिया। उनको मल्लशालाओं और नर्तकियों के कोठों पर जाने में अधिक रस आने लगा। इस प्रकार यह प्रथा हो गई कि शिक्षा में दो विशेष विषय ही हों। एक युद्धविद्या और दूसरे संगीत तथा नृत्य-कला। युवक युद्ध-विद्या का अध्ययन करने लगे और युवतियाँ संगीत तथा नृत्य सीखने लगी।’’

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