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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘इसका परिणाम वीरभद्र की पाठशाला पर भी पड़ा। विद्यार्थियों की संख्या शून्य हो गई। इस पर उसने तथा उसके पुत्र सोमप्रभ ने राज्य का द्वार खटखटाया। जिस राज्य में सैनिक धड़ाधड़ रखे जा रहे थे, उस राज्य के पास एक ब्राह्मण के लिए कार्य नहीं था। उसको कह दिया गया कि वह अपनी पाठशाला में नृत्य अथवा संगीत की शिक्षा देनी आरम्भ कर दे। वह ऐसा नहीं कर सका। परिणाम यह हुआ कि उसने शिक्षा का कार्य छोड़ दूध बेचने का कार्य आरम्भ कर दिया।’’

‘‘परन्तु महाराज। उसमें भी धर्माचरण करते हुए निर्वाह नहीं हो सका। बाजार में दूध दो टके का सेर-भर मिलता था। शुद्ध दूध इस भाव पर बेचने में हानि होती थी। अन्य लोग दूध में पानी मिलाकर बेचते थे। इस कारण उनको भी ऐसा करना पड़ा। इससे सोमप्रभ अत्यन्त दुःखी हुआ और दुःख में क्षयरोग में ग्रस्त हो परलोक गमन कर गया। सोमप्रभ की तीन कन्याएँ थीं। सोमप्रभ का पिता दूध बेच उनका पालन-पोषण करने लगा।’’

‘‘किसी घटनावश मुझको उनकी इस दुर्दशा का पता चला तो मैंने भीष्मजी को उनके विषय में कहा। भीष्मजी ने उनको देहात में एक पाठशाला में मुख्याध्यापक बनाकर भेज दिया। परन्तु वहाँ पर भी कार्य नहीं चल सका। लोग पठन-पाठन में रुचि खो बैठे थे और इस कार्य से धन की उपलब्धि होनी बन्द हो गई थी। राज्य की ओर से पचास रजत उनको अवश्य मिलता रहा, परन्तु इसमें उनका निर्वाह अत्यन्त कठिनाई से होता था।’’

‘‘पाठशाला में कार्य न होने के कारण दान-दक्षिणा पर निर्वाह करना वीरभद्रजी को रुचिकर प्रतीत नहीं हुआ। उन्होंने प्रजा की रुचि बदलने के लिए धर्मोदेश का कार्य आरम्भ कर दिया।

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