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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
वे नित्य इतिहास, पुराणादि की कथा करने लगे। पहले तो देहात के लोग उनकी कथाओं में आने लगे, परन्तु जब उन्होंने अनुभव किया कि वह उनकी रुचि को युद्ध तथा संदीत-नृत्य आदि से बदलना चाहता है, तो वे उनसे रुष्ट रहने लगे। एक दिन वह लड़कियों को नृत्य आदि सिखाने का विरोध करने लगा। अपने कथन की सत्यता का प्रमाण देने के लिए उसने एक पड़ोसी ग्राम के परिवार की कथा सुनाई। इससे उस परिवार के युवक उसके शत्रु बन गये। उन्होंने एक रात उसके गृह पर आक्रमण कर उसको मार डाला। वीरभद्र की एक पौत्री का विवाह हो चुका था। अन्य दो पौत्रियाँ तथा उसकी पुत्र-वधू, उसके मारे जाने पर निराश्रय हस्तिनापुर लौट पड़ी। परन्तु वे वहाँ पहुँच नहीं सकीं। उन लड़कियों को उसी गाँव के कुछ युवकों ने पकड़कर वेश्यावृत्ति के लिए विवश कर दिया।’’
‘‘मुझको इस घटना का पता चला तो मैंने उनका पता करना चाहा परन्तु अभी तक उनका पता नहीं चला।’’
‘‘महाराज! यह है राज्य की अवस्था इसका सुधार होना चाहिए, अन्यथा यह अवस्था कहीं विस्फोटक बन गई तो राज्य-परिवार का नाश भी हो सकता है।’’
इस कथा में धृतराष्ट्र बहुत ही चिन्ता अनुभव करने लगा। उसने इस विषय में स्वयं ही एक दिन भीष्मजी से कहा। भीष्मजी उसकी बात सुन कहने लगे, ‘‘देखो बेटा! हमारा राज्य धन-धान्य से बहुत भरपूर है। जो धन एक बार एक राज्य में आता है, वह इस राज्य के बाहर नहीं जाता।’’
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