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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘अब प्रश्न यह रह जाता है कि यहाँ धन किसको प्राप्त होता है? धन उसको मिलता है जो धन के स्वामियों को उनकी इच्छित वस्तु दे सकते हैं। हमारे राज्य में अस्त्र-शस्त्रों की भारी माँग है। अतः जो इनके निर्माण तथा विक्रय का कार्य कर रहे है, वे भारी आय कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त हमारे धन के स्वामियों की आवश्यकता होती है मनोरंजन की और उसकी पूर्ति करती हैं वेश्याएँ तथा नर्तकियाँ। ऐसी स्त्रियाँ अब भूषणों से लदी दिखाई दे रही हैं। जो लोग किसी प्रकार का व्यवसाय नहीं कर रहे हैं, वे अवश्य निर्धन रहेंगे।

‘‘इसका परिणाम यह हो रहा है कि हमारे राज्य में क्षत्रिय-वर्ग तथा वैश्य वर्ग अधिक और अधिक सन्तुष्ट हो रहा है और ब्राह्मण-वर्ग, जो कुछ भी जनोपयोगी कार्य नहीं कर रहा, निर्धन बनकर भूखा मर रहा है।’’

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