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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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वैदिक काल की व्यवस्था थी कि समाज के चार वर्ण हों और चारों वर्णों को पनपने का अवसर मिले। यह मिट रही थी। दो वर्ण ही विशेष पनप रहे थे–क्षत्रिय तथा वैश्य। क्षत्रियों में भी सैनिकों की संख्या बढ़ रही थी। जो शासन कार्य जानते थे वे कम हो रहे थे। परिणामस्वरूप उच्छृङ्खलता बढ़ रही थी। शासन ढीला होने से पापा-चरण बढ़ रहा था।
वैश्यों में वे व्यवसायी पनप रहे थे, जो विषय-भोग की सामग्री बनाते अथवा बेचते ये। इस वर्ण में वेश्याओं और उनके प्रयोग में आने वाले प्रसाधन बनाने वाले ही अधिक थे।
एक बात भीष्मजी ने कर दी थी। एक बार जो धन राज्य में आ गया, उसको बाहर नहीं जाने दिया जाता था। बाहर के राज्यों से न तो अन्न-अनाज और न वस्त्रादि सामान राज्य में लाया जाता था। बाहर से तो केवल सोना और मणि-माणिक्य ही राज्य में आते थे।
क्षत्रिय-वर्ग तथा वैश्य-वर्ग के अतिरिक्त शूद्र-वर्ग था, जो उक्त दोनों वर्गों की सेवा में रत था।
मेरे लिए राज्य में कोई निश्चित कार्य नहीं था। प्रायः मैं राज्य के गाँवों में अथवा नगरों में भ्रमण कर जानकारी प्राप्त किया करता था। अन्यथा मैं धृतराष्ट्र के साथ ही रहता था।
धृतराष्ट्र की आँखें तो मैं ही था। उसकी पत्नी गान्धारी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध अपने पति की सबसे अधिक उपयोगी सेवा से वंचित हो गई थी। पत्नी पति की अर्द्धंगिनी होती है, अर्थात् पति में जो अभाव हो उसकी पूर्ति पत्नी द्वारा होती है, परन्तु धृतराष्ट्र में सबसे बड़ी कमी उसकी दृष्टि थी और उसकी पूर्ति गान्धारी कर सकती तो वह उसकी सबसे बड़ी सेवा करती, परन्तु अपनी आँखों पर पट्टी बाँध कर उसने अपने-आपको इसके अयोग्य कर लिया था।
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