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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
एक दिन मैंने पूछ लिया, ‘‘महारानीजी ‘! इस पट्ठी बाँधने से किसको और क्या लाभ हो रहा है?’’
‘‘संजयजी!’’ गान्धारी ते कहा, ‘‘सबसे अधिक लाभ तो मुझको ही है। मैंने अपने पतिदेव को चुक्ष-रहित नहीं देखा। इस कारण मेरे लिए मेरे पति का चक्षु-हीन होने के अब गुण का कुछ अर्थ नहीं रखता। अतः मेरे लिए चक्षु रहते हुए भी, मेरे पति से अधिक श्रेष्ठ, संसार में कोई नहीं है।’’
मैं यह तो नहीं कह सका कि ये मूर्खों की-सी बातें हैं। किसी वस्तु को न देखना उसके अभाव को प्रकट नहीं करता। इसपार भी मैंने कह दिया, ‘‘यदि आपने पट्टी न बाँधी होती तो कदाचित् महाराज की अधिक सेवा कर सकतीं और उनको अधिक सुख पहुँचा सकतीं।’’
‘‘इसके लिए राज्य ने आपको रखा हुआ है और महाराज आपकी इन सेवाओं के लिए आपके आभारी है।’’
इस युक्ति का उत्तर न देना ही मैंने उचित समझा। इस कारण मैं चुप हो गया। इस पर महारानी ने बात बदलते हुए कहा, ‘‘संजयजी! आप ही कभी शतश्रृंग पर्वत पर चले जाइये और वहाँ हमारे देवर और उनके बच्चों को देख आइये।’’
मैंने कहा, ‘‘महारानीजी! आप महाराज के साथ चलिए तो अच्छा नहीं होगा क्या?’’
‘‘मैंने महाराज कुमार भीष्मजी से कहा था। वे तो मान गए थे, परन्तु दुर्योधन ने इसका घोर विरोध किया। दुर्योधन का कहना था कि हम दोनों देख तो सकते नहीं, फिर वहाँ जाने से क्या होगा?’’
‘‘परन्तु महारानीजी! दुर्योधन इस बात का विरोध क्यों कर रहा है?’’
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