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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।

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एकाएक एक दिन मुझको भीष्मजी की आज्ञा मिली थी कि मुझे मथुरा जाना चाहिए। मथुरा के राजा कुरु-राज्य को कर देते थे। इसके प्रतिहार में कुरुराज्य ने मथुरा को उसके पड़ोसी राज्यों से रक्षा का वचन दिया हुआ था। इसी नाते कंस ने कुरु-राज्य से सहायता माँगी थी। मथुरा के राजा की यह माँग थी कि कुरु-राज्य अपनी सेना से उसकी रक्षा करे। भीष्मजी चाहते थे कि मैं वहाँ जाकर यह जानने का यत्न करूँ कि राजा कंस को किससे भय है और किस प्रकार की सहायता वह चाहता है।

इस कार्य के मिलने से मुझे प्रसन्नता हुई। मैं जाकर देखना चाहता था कि वृन्दावन में वह कौन व्यक्ति है, जिस पर सुरराज भारत के उद्धार की आशा लगाये हुए हैं। वृन्दावन मथुरा के समीप, यमुना के पार एक ग्राम था।

आज्ञा मिलते ही मैं चल पड़ा और तीन दिन की यात्रा के पश्चात् मैं मथुरा जा पहुँचा। मथुरा एक समृद्ध नगर था। यहाँ से एक लम्बा-चौड़ा जांगल्य देश आरम्भ होता था, जिसका राजा बृहत्बल था। बृहत्बल राजा कंस के व्यवहार से प्रसन्न नहीं था।

मैंने जब अपना नाम और कंस से मिलने की इच्छा राजप्रासाद के अन्दर कंस के पास भेजी तो वह नंगे पाँव ही भागता हुआ आया और आदर-सहित मुझको भीतर ले जाकर, अपने समीप बैठाकर कुशलक्षेम पूछने लगा।

मुझको राजप्रासाद के मुख्य अतिथि-गृह में ठहराया गया और कहा गया कि दो दिन विश्राम करने के पश्चात् बातचीत होगी।

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