|
उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
|
137 पाठक हैं |
हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
इस काल में मैंने वहाँ की परिस्थिति का ज्ञान प्राप्त करने का यत्न करना आरम्भ कर दिया। कंससर्वथा नास्तिक था। वह क्रूर और धर्म-विहीन व्यक्ति था। उसके राज्य में उसकी इच्छा ही धर्म माना जाता था। वैसे तो नगर धन-धान्य से भरपूर था, आवश्यकता के पदार्थ हस्तिनापुर से सस्ते थे और दुकानें सामान से लदी हुई थीं, परन्तु प्रजा की क्रयशक्ति बहुत कम थी।
राजप्रासाद के लोग भी कंस के व्यवहार से प्रसन्न नहीं थे। मेरे वहाँ पहुँचने के दिन ही एक दासी, जो यह जान गई थी कि मैं कौन हूँ और किस अर्थ वहाँ आया हूँ, मेरे पास आकर कहने लगी, ‘‘यदि आप मेरा नाम न लें, तो मैं आपको बहुत कुछ बता सकती हूँ।’’
‘‘पर तुम मुझको बताना क्यों चाहती थी?’’ मैंने पुछा।
‘‘इस कारण कि आप यहाँ की व्यवस्था जानने आये हैं।’’
‘‘किसने बताया है तुमको? मेरे यहाँ आने का यह प्रयोजन नहीं है।’’
‘‘देखिए महाराज! जब आने का समाचार द्वारपाल महाराज के पाल लेकर आया, तो एक व्यक्ति महाराज के पास उपस्थिति था। द्वारपाल ने जब बताया कि आप कुरु-राज धृतराष्ट्र के निजी मंत्री हैं, और यहाँ की राज्य-व्यवस्था देखने के लिए आये हैं तो उन्होंने उस व्यक्ति को तथा नर्तकी को, जो उस समय नृत्य कर रही थी, वहाँ से विदा कर दिया और भागे हुए आपका स्वागत करने चले गए। आपको दो दिन विश्राम करने के लिए इस कारण कहा गया है जिससे आपको वास्तविक परिस्थिति से अपरिचित रखने का प्रबन्ध पूरा हो जाये तथा इस बीच आपकी पूरी सेवा-शुश्रूषा कर, आपको प्रसन्न कर दिया जाये। तब आप महाराज कंस की बातों पर सन्देह करने का साहस ही नहीं करेंगे।’’
|
|||||

i 









