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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


दासी के इस कथन पर कि मैं कंस के अनैतिक व्यवहार पर सन्देह ही न कर सकूँगा, मुझे क्रोध चढ़ आया। मैं उसे डाँटकर आगार से बाहर निकाल देना चाहता था, परन्तु जब डाँटने के लिए मैंने उसके मुख की ओर देखा तो उसकी आँखों की चमक देख अपने मन की बात कह नहीं सका। मुझमें इस स्त्री की बात सुनने की उत्सुकता जाग्रत हो गई। मेरी चढ़ी भृकुटि उतर गई और मैंने कहा, ‘‘देखो देवी! मैं क्या हूँ और यहाँ की बातों को देख, सुन और जानकर क्या करूँगा, इसको छोड़ो! तुम बताओ कि अपने स्वामी की निन्दा क्यों कर रही हो? इसमें क्या कारण है। इस बात के जाने बिना जो कुछ भी तुम कहोगी, मेरे मन पर उचित प्रभाव उत्पन्न नहीं करेगा?’’

‘‘मैंने तो महाराज! आपसे निवेदन किया ही है कि मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ, परन्तु जब आप मुझको बीच में न लायें, अर्थात मेरा नाम किसी खो न बतायें। मैं आपको यह सब क्यों बताना चाहती हूँ और अन्य किसी को नहीं, यह मैंने वर्णन कर दिया है। मेरा इस बताने में क्या प्रयोजन है, यह आपका वचन मिलने के पश्चात् ही बताऊँगी।’’

मैं गम्भीर विचार में पड़ गया। एक बात मुझको समझ आ गई कि वह दासी बुद्धिशील, युक्ति और तर्क जानने वाली और साथ ही किसी विशेष प्रयोजन से ऐसी बात करने आई हैं, जिसके लिए यह समझती है कि इसको संकट में पड़ने की सम्भावना है। मैंने मन में निश्चय कर लिया कि इसको सुन अवश्य लेना चाहिए। अतः मैंने कहा, ‘‘तुम तो अच्छी पढ़ी-लिखी और अन्य दासियों से उच्च श्रेणी की प्रतीत होती हो। देखो देवी! मैं किसी भी बात पर विश्वास नहीं कर सकता, जब तक उसकी सत्यता की परीक्षा न कर लूं और इस परीक्षा में प्रथम चरण कहने वाले थे उद्देश्य को जानना है। यही कारण है कि मैंने तुमसे प्रश्न किया था। रही वचन की बात कि तुमको अपने स्वामी से तुम्हारी बातों पर दण्ड नहीं दिलवाऊँगा, यह तो सत्य, झूठ और उद्देश्य का निर्णय करने के पश्चात् ही दे सकता हूँ। देवी! यदि तुम्हारी बात सत्य हुई और उसमें उद्देश्य श्रेष्ठ हुआ तो विश्वास रखो कि न केवल तुम्हारी रक्षा होगी, प्रत्युत इसके लिए तुम्हें विशेष पुरस्कृत भी किया जायेगा।’’

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