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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
मेरे मन में उस दासी की बात जानने की लालसा जाग्रत हो गई थी, इस पर भी अपने पद की महानता का विचारकर अपनी बात में कारण तथा तत्व रखना चाहता था। वह स्त्री कुछ काल तक आँखें नीची किये विचार करती रही। उसके बाद अपनी आँखों में अश्रु, जो अब बहने लगे थे, पोंछकर बोली, ‘‘मुझको आपके आश्वासन पर विश्वास है और मैं सब-कुछ सत्य ही कह रही हूँ। सात ही मेरे कहने का उद्देश्य स्वार्थपूर्ण होते हुए भी श्रेष्ठ है।
‘‘सुनिये मैं महाराज कंस की सौतेली बहन हूँ। उनके पिता की मैं दासी-पुत्री हूँ। मेरा नाम इनके पिता ने रमणी रखा था और उन्होंने मेरे नाम को सार्थक कर दिया है। मेरे साथ बलपूर्वक रमण किया गया है। मैंने इनको कहा भी था कि मैं इनके पिता को पुत्री होने के नाते इनकी बहन हूँ, पर यह नहीं माने।’’
‘‘जब-जब भी यह मेरे साथ पशुओं-जैसा व्यवहार करते थे इनकी बहन देवकी, जिसकी सेवा के लिए मुझे नियुक्त किया गया था, इनकी ताड़ना करती थी, परन्तु यह हँसकर उनकी बात टाल दिया करते थे। यह आज से पन्द्रह वर्ष पूर्व की बात है।’’
‘‘मैं इनके पिता के एक सेवक मोदक से प्रेम करती थी। उससे मेरा विवाह हो भी गया था, परन्तु जब उनको पता चला कि मैं कुमार की वासना-तृप्ति कर चुकी हूँ तो उन्होंने मुझे छोड़ दिया। मैं कुमार से तीन वर्ष बड़ी थी, अतः मुझको भली-भाँति अपमानित कर और श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करने के अयोग्य कर, उसकी रुचि अन्य स्त्रियों की ओर हो गई।’’
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