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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘इस पर भी मैं अपने भाग्य पर सन्तोष कर चुप रहती, परन्तु बड़े महाराज के देहावसान के पश्चात् तो कुमार गद्दी पर बैठते ही उच्छृख्ङल जीवन व्यतीत करने लगे। इस समय आस-पड़ोस के सब दुष्ट और नीच लोग इनके पास एकत्र होने लग गये। यह देख-भर के अपने प्रवृत्ति के लोगों को अपना मित्र बनाने लगे और अपने राज्य की सुन्दर स्त्रियों को उनके लिये उपहार में उपस्थित करने लगे। उन स्त्रियों में मैं भी उन युवकों की काम-लिप्सा की तृप्ति के लिए दी जाती रही। इस बात पर इसकी बहन देवकी इससे रुष्ट हो, यहाँ से चले जाने का विचार करने लगी। जब भाई बहन में लड़ाई-झगड़ा रहने लगा तो इसने उसके लिए वर ढूँढ़ लिया। राजकुमार शिशुपाल, जो भोग-विलास के लिए मथुरा आया करता था, देवकी के लिए वर ढूँढ़ा गया।’’
‘‘देवकी गुर्जर देश-अधिपति उग्रसेन के पुत्र वसुदेव से प्रेम करती थी। एक बार वसुदेव मथुरा में आये तो देवकी से उनकी भेंट हो गई और दोनों एक-दूसरे से प्रेम करने लगे। दोनों में पत्र-व्यवहार चलने लगा और विवाह भी लगभग निश्चित हो गया।’’
‘‘वसुदेव और देवकी दोनों जानते थे कि कंस उनके विवाह को पसन्द नहीं करेगा, इस कारण चोरी-चोरी वे अपना विवाह करने की योजना बनाने लगे। मैं उनकी इस योजना में सहायक थी; क्योंकि कंस के व्यवहार से मैं अति रुष्ट थी।’’
‘‘परन्तु महाराज एक घटनावश देवकी के रहस्य को जान गये एक रात वसुदेव का विश्ववस्त भृत्य देवकी को भगा ले जाने का प्रबन्ध करने आया। उसने मुझे वसुदेव की सारी योजना बताई और मुझे देवकी को तैयार होने के लिए कह दिया। कारणवश महाराज कंस मेरे आगार में आ पहुँचे। उन्होंने मेरे आगार के बाहर खड़े होकर उस भृत्य द्वारा बताई योजना का अंश सुन लिया।’’
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