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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘वसुदेव की योजना यह थी कि वह एक भृत्य के वेश में आयेगा और देवकी के प्रासाद में दोनों का विवाह होगा और तत्पश्चात् वे दोनो वेश बदलकर प्रासाद से निकल जायेंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि महाराज कंस को इस योजना के अन्तिम चरण का ही पता चला था, परन्तु उनको विवाह का पता नहीं चला। उस भृत्य के चले जाने के पश्चात् महाराज मेरे आगार में आयें और मुझसे प्रेम प्रकट करने लगे फिर मुझे बहुत-सा स्वर्ण देककर कहने लगे कि मैं देवकी को शिशुपाल से विवाह करने के लिए तैयार करूँ। उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि यदि मैं उनका यह काम कर सकी तो वे मुझको इतना स्वर्ण देंगे कि मैं स्वतन्त्र होकर जीवन-पर्यन्त अपना निर्वाह कर सकूँगी।’’

‘‘मैंने वसुदेव के सेवक और कंस, दोनों की योजना देवकी को बता दी। इससे उसने वसुदेव की योजना में थोड़ा अन्तर कर दिया। विवाह तथा भागने की तिथि एक दिन पूर्व कर दी गई।’’

‘‘मैंने वसुदेव के भृत्य को, जो नगर में ही एक गृह में ठहरा हुआ था, यह सूचना दे दी कि विवाह एक दिन पूर्व ही होगा। निश्चित दिन वसुदेव आया और उसका देवकी के साथ विवाह हो गया। दुर्भाग्य से विवाह समाप्त होने के तुरन्त पश्चात् उनके भागने से पूर्व कंस वहाँ आ पहुँचा। उसने दोनों को यज्ञवेदी से उठते देखा। विवाह कराने वाले ब्राह्मण की हत्या तो वहीं कर दी गई और वसुदेव की हत्या भी कर दी जाती, परन्तु देवकी वसुदेव से लिपट गई और यत्न करने पर भी उससे पृथक् नहीं की जा सकी। वसुदेव ने कंस को युद्ध के लिए ललकारा तो देवकी ने स्पष्ट कह दिया कि यदि वसुदेव मारा गया तो वह सती हो जायेगी। वह अब धर्म से वसुदेव की पत्नी बन चुकी है।’’

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