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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘कंस ने परिस्थिति को समझा और दोनों को बन्दी बनाने का आदेश दे दिया। कंस ने कहा, ‘‘अच्छी बात है, यदि तुम्हारा इस पुरुष से बहुत मोह हो गया है, तो तुमको यह मिलेगा, परन्तु तुम दोनों मेरे बन्दी रहोगे। विवाह तो हो गया है, परन्तु विवाह से उत्पन्न सन्तान का सुख तुमको नहीं मिलेगा।’’

‘‘उस समय तो हम जान नहीं सके कि इस क्रूर व्यक्ति के इस कथन का क्या अर्थ है, परन्तु पीछे यह बात स्पष्ट हो गई।’’

‘‘देवकी और वसुदेव पन्द्रह वर्ष से कंस के बन्दी हैं और उनकी जो भी सन्तान उत्पन्न होती है, मार डाली जाती है और देवकी तथा वसुदेव की सात सन्तानों की हत्या की जा चुकी है। आठवीं सन्तान उत्पन्न होने के समय वसुदेव ने बन्दीगृह के सेवकों से बहुत अनुनय-विनय की और उनकी सहायता से उनको बचाकर वृन्दावन-वासी नन्द के गृह पर सुरक्षित पहुँचा दिया गया और उसी दिन उसकी उत्पन्न कन्या को लाकर देवकी की गोद में डाल दिया गया। अगले दिन कंस आया तो उसने उस कन्या को मार डाला। उस समय उसको पता नहीं चला कि वसुदेव की आठवीं सन्तान बच गई है। इसको आज तीन वर्ष व्यतीत हो चुके हैं।’’

‘‘नन्द ने यह जान कि किसी समय भी वसुदेव के पुत्र की, जिसका उसने कृष्ण नाम रखा है, कंस के सैनिक आकर हत्या कर सकते हैं, अपने को महाराजा बृहत्बल के अधीन कर, उसने अपनी और गाँव वालों की रक्षा की प्रार्थना कर दी। बृहत्वल तो पहले ही कंस का विरोधी था। उसने नन्द के प्रस्ताव को स्वीकार कर, गाँव की रक्षा के लिए अपने सैनिक भेज दिये। साथ ही यमुना के पार गाँवों की रक्षा के लिए एक दुर्ग निर्माण कर लिया है।’’

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