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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘जब कंस को पता चला कि देवकी की एक सन्तान बच गई है, तो वह अति दुःखी हुआ। वह बृहत्बल पर आक्रमण कर अपना नाश नहीं करवाना चाहता। इस कारण चोरी-चोरी उस बालक कृष्ण को मरवाने के उसने कई उपाय किये है। अभी तक तो उसके सब उपाय विफल गये हैं। अब उसने कौरव-सम्राट् को अपना सहयोगी बनाकर अपनी इच्छा-पूर्ति का उपाय करना चाहा है।’’

‘‘देखो दासी!’’ मैंने उसकी आँखों में घूरकर देखते हुए कहा, ‘‘तुम अपने स्वामी के विरुद्ध पाप का एक घोर आरोप लगा रही हो। इस कारण इसके असत्य होने पर तुम बची नहीं रह सकतीं। बृहत्बल हमारा मित्र है। वह हमारे राज्य का एक अति सुदृढ़ स्तम्भ है। उसका विरोध कंस नहीं कर सकेगा। और तुम यही आरोप उस पर लगा रही हो। भला यह बताओ कि कंस देवकी की सन्तानों की हत्या क्यों करवा रहा है?’’

‘‘देखिए श्रीमान्! जो कुछ मैंने वर्णन किया है, वे सत्य घटनाएँ है। अब आप उनमें कारण पूछ रहे हैं। इन कारणों को तो वही व्यक्ति बता सकता है, जो इनके करने वाला है। मैं तो अपना अनुमान ही बता सकूँगी। वे कल्पना मात्र भी हो सकते हैं। इस कारण मैं उनकी नहीं बताऊँगी। इस विषय में आप उनसे ही पूछ सकते हैं।’’

‘‘मेरा यह कथा बताने का उद्देश्य तो स्पष्ट ही है। मैं देवकी की दासी, बहन और सखी हूँ। मैं उसकी एकमात्र बची हुई सन्तान की रक्षा चाहती हूँ। मैं उसको और उसके पति मुक्त कराने में रुचि रखती हूँ और साथ ही जिसने मेरे जीवन को नीरस कर दिया है, उसका सर्वनाश चाहती हूँ।’’

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