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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


इस दासी की कथा सुन वास्तव में मुझे बहुत दुःख था, साथ ही सुरराज का कथन स्मरण कर कि वृन्दावन में एक महान् शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ है, मन में विचार कर रहा था कि क्या वह शक्ति यही बालक है? मैं इस बालक को देखने के लिए उत्सुकता अनुभव करने लगा।

कुछ देर तक विचार करने के पश्चात् मैंने उस दासी से पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है? तुमने अपना नाम नहीं बताया।’’

‘‘मुझको इस स्थान पर सुन्दरी के नाम से सम्बोधित किया जाता है। मेरी माँ ने मेरा नाम सुखिया रखा था। कंस के पिता ने मेरा नाम रमणी रखा था और मैं अपने-आपको पगली कहती हूँ।’’

‘‘मैं उसके इस प्रकार चार नाम-बताने पर हँस पड़ा। हँसकर मैंने कहा, ‘‘पगली तो तुम हो नहीं। तुम इस कथा के अनुसार सुखिया प्रतीत होती हो। रही सुन्दरी, यह तो देखने वाले की दृष्टि के अनुसार ही हो सकता है। तुम किसी-किसी की दृष्टि में सुन्दरी भी हो सकती हो। क्या आयु होगी तुम्हारी?’’

‘‘इस समय चालीस वर्ष के लगभग हूँ।’’

‘‘तो यह कंस सैंतीस वर्ष का है? अर्थात् यह अपनी बहन को बन्दी बनाने के समय चौबीस वर्ष का था। जब इसने तुमको पतित किया था, वह कितने वर्ष का था?’’

‘‘बाईस वर्ष का। देवकी इससे पाँच वर्ष छोटी है। बन्दी होने के समय वह उन्नीस वर्ष की थी।’’

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