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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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मथुरा में मैं तीन दिन रहा और सुन्दर नर्तकियों से घिरा रहा। कंस के कुछ मित्र भी यहाँ उपस्थित थे और सब-के-सब मुझको प्रसन्न रखने लिए प्रत्येक प्रकार का प्रयत्न करने में लगे हुए थे।
यदि सुखिया ने मुझे सतर्क ने किया होता तो कदाचित् इन सुन्दर नर्तकियों के नयन-कटाक्षों में पराजित होकर मद्य और सुन्दरियों के सागर में डूब गया होता। रात्रि के समय जब वे मेरी शैया पुष्पादि से सजाकर मुझको अत्यन्त मीठी गन्ध की सुगन्धियों से सुवासित करना चाहतीं तो मैं अपने को उनके मोह-जाल में फँसने से बचाने में अति कठिनाई अनुभव करता। मैं उस समय उनको चले जाने के लिए कहता तो वे स्वर्ग-पात्रों में शीतल, सुवासित मदिरा भरकर उपस्थित कर देती और उसको चखने का आग्रह करने लग जातीं।
तीसरी रात को उनमें एक, जो अभी पन्द्रह-सोलह वर्ष की लड़की मात्र ही थी, अर्ध-नग्नावस्था में मेरी शैया पर आ बैठी। वह मेरे गले में बाँह डालने ही वाली थी कि मैंने उसको पकड़कर बलपूर्वक शयनागार से बाहर धकेल दिया। यह दूर जा खड़ी हुई और मुझको पौरुषविहीन समझ हँसती हुई वहाँ से चल दी।
वास्तव में मेरा देवलोक में मेनका का चित्र खींचते समय संयम का अभ्यास काम आया। यह लड़की मेनका की तुलना में कुरूप ही कही जा सकती थी।
चौथे दिन प्रातः कंस बहुत परेशान दिखाई दिया। मैंने उससे पूछ ही लिया, ‘‘महाराज, आज आपका मुख मलिन क्यों है?’’
‘‘मैं समझता हूँ,’’ कंस ने कहा, ‘‘मैं आपको प्रसन्न नहीं कर सका।’’
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