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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘यह आप कैसे कहते हैं महाराज! आपके तीन दिन के आतिथ्य से मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। मैंने जितना सुख और आराम आपके राज्य में आकर पाया है, उतना कहीं नहीं पाया।’’
‘‘मैं समझता हूँ महाराज! अब विश्राम बहुत हो चुका है। आप आज्ञा कीजिए कि किस अर्थ आपने हस्तिनापुर से दूत को आमन्त्रित किया है?’’
‘‘संजयजी! जितनी सेवा मैं आपकी करना चाहता था, मैं कर नहीं सका। इस पर भी यदि आप इतने-मात्र से सन्तुष्ट है, तो अब मैं अपने राज्य के सम्बन्ध में आपसे बातचीत करना चाहता हूँ। मैं और बृहत्बल, दोनों हस्तिनापुर राज्य के अन्तर्गत हैं। अतः हम दोनों का परस्पर युद्ध करना शोभायुक्त नहीं। यदि हम दोनों में युद्ध छिड़ गया तो मेरे और बृहत्बल के मित्र भी इसमें सम्मिलित हुए बिना नहीं रहेंगे। तब कदाचित् हस्तिनापुर को भी मेरी अथवा दूसरी ओर से युद्ध में सम्मिलित होना पड़े। इस कारण मैं बृहत्बल के विरुद्ध अपनी बात महाराज धृतराष्ट की सेवा में उपस्थित कर, युद्ध के बिना ही इसका निर्णय चाहता हूँ।’’
‘‘यमुना-पार वृन्दावन और पच्चीस अन्य गाँव आज से सात वर्ष पूर्व मेरे राज्य में थे। अब उन गाँवों पर बृहत्बल ने अधिकार कर वहाँ एक दुर्ग बना, उसमें अपने सैनिक बिठा दिये हैं। मैंने बृहत्बल को उस भूमि से अपने सैनिक हटाने के लिए कहा है, परन्तु वह मानता नहीं।’’
मैंने कहा, ‘‘यह तो सत्य ही बहुत बुरी बात है, परन्तु यह आप कैसे सिद्ध कर सकेंगे कि वह भूमि आपके राज्य में थी?’’
‘‘इसके लिए मैं साक्षी उपस्थित कर सकता हूँ।’’
‘‘उस भूमि पर रहने वाले अथवा उससे बाहर के रहने वाले?’’
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