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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘उस भूमि पर रहने वालों को तो मैं उपस्थित कर नहीं सकता। वे बृहत्बल के सैनिकों के प्रभाव में हैं।’’
‘‘तब तो मुझको गुप्त रूप से उस भूमि पर जाकर वहाँ के रहने वालों से पूछ-ताछ करनी होगी।’’
‘‘परन्तु संजयजी! यदि वे मेरे इस कथन के विपरीत कहने पर विवश किये गए होंगे, तब आप कैसे जान सकेंगे?’’
‘‘इसको मुझ पर छोड़ दीजिए। इसके साथ ही मुझको बृहत्बल की राजधानी भरत नगरी में भी जाना होगा और उससे भी इस विषय में जानकारी प्राप्त करनी होगी।’’
‘‘परन्तु जो लोग यहाँ गाँव वालों से कर प्राप्त करते रहे हैं, वे साक्षी क्यों नहीं कर सकते?’’
‘‘साक्षी तो वे दे सकते हैं, परन्तु जब तक उनकी साक्षी का समर्थन किसी बाहरी स्त्रोत से न होगा, तब तक वे विश्वसनीय नहीं समझे जा सकते।’’
‘‘उस कर-प्राप्ति का उल्लेख राज्य के बहीखाते में भी तो हो सकता है।’’
‘‘वह प्रमाण भी गौण है। इसके साथ ही यह जानने की आवश्यकता होगी कि उन गाँवों के लोग आपको अपना राजा स्वीकार करने के लिए इस समय तैयार हैं अथवा नहीं।’’
‘‘क्या अर्थ है इसका?’’
‘‘इसका अर्थ यह है कि यदि उन गाँव वालों को आप सन्तुष्ट नहीं रख सके तो वे आपका राज्य छोड़कर किसी दूसरे को अपना राजा मान सकते हैं।’’
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