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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘यह कैसे? यदि वे मेरे अधीन रहना नहीं चाहते तो वे मेरा राज्य छोड़कर कहीं अन्यत्र जा सकते हैं, परन्तु उनका अपने स्थान पर रहते हुए राज्य को छोटा करने का अधिकार नहीं हो सकता।’’

‘‘नहीं महाराज! यह बात इस प्रकार नहीं है। भूमि का सम्बन्ध भूमि पर बसे हुए लोगों से है। राजा भूमि का स्वामी नहीं होता। किसी गाँव में परती भूमि भी तो गाँव की साँक्षी सम्पत्ति होती है और गाँव की पंचायत के अधिकार में होती है। जिस राज्य में लोग रहना चाहेंगे, उनकी भूमि भी उसी राज्य में चली जायेगी।’’

‘‘तो ये लोग भूमि-कर किस लिए देते हैं?’’

‘‘भूमि-कर तो राज्य के सैनिकों द्वारा राज्य की रक्षा के लिए दिया जाता है, अन्यथा राज्य का अधिकार नहीं कि वह प्रजा से एक टका भी कर के रुप में ले।’’

‘‘हमारे राज्य का नियम है कि भूमि का स्वामी राजा होता है जो भी व्यक्ति उस भूमि का प्रयोग करना चाहता है, वह राज्य को भूमि का भाड़ा देता है।’’

‘‘यह भारतीय परम्परा नहीं है महाराज! भूमि तो भूमि जोतने वाले की है। राजा अपने राज्य के अन्तर्गत भूमिपतियों से कर प्राप्त करता है, इस कारण कि राज्य उनकी रक्षा करता है। यदि वे लोग आपके राज्य में सुरक्षा नहीं समझते तो उनको अधिकार है कि वे किसी दूसरे राजा को अपना संरक्षक मान लें।’’

‘‘संजयजी! यह कौन निश्चय करेगा कि कोई व्यक्ति किस राज्य में सुरक्षित है?’’

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