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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘यह गाँव की पंचायत निर्णय करती है। यदि वृन्दावन आदि गाँवों के लोग आपके राज्य में रहना चाहते हैं और बृहत्बल उन पर अपना राज्य बलपूर्वक बनाये हुए हैं, तब तो युद्ध की आवश्यकता है, अन्यथा नहीं।’’

‘‘जहाँ तक मुझको विदित है, वृन्दावन को बृहत्बल ने अपना राज्य बलपूर्वक बनाया हुआ है।’’

‘‘इसकी जाँच करनी होगी। प्रथम तो वह जानना है कि वे गाँव कभी मथुरा-राज्य में थे अथवा सदा से भरत-राज्य में है। दूसरे यह जानना है कि इन गाँवों ने भरत-राज्य स्वेच्छा से स्वीकार किया है अथवा विवश होकर। तीसरे, इनको विवश करने वाला कौन है? तदनन्तर हस्तिनापुर इस विषय में हस्तक्षेप करने के विषय में विचार करेगा।’’

इस पर कंस चुप हो गया। उसकी योजना तो यह थी कि हस्तिनापुर के राजदूत को मद्य और सुन्दरियों के जाल में फँसाकर उससे सच्ची-झूठी सूचना हस्तिनापुर को लिखवा देता। तत्पश्चात् भरत-राज्य के यमुना पार के गाँव वह अपने अधिकार में कर लेता। इस सबके लिए कंस लाखों स्वर्ण राजदूत को देने को तैयार था। अब, मुझको अपनी योजनानुकूल न मान, उसने मेरी सेवा-शुश्रूषा में ढील कर दी। उस रात साधारण भोजन मिला और साथ ही एकान्त। न तो कोई नर्तकी आई और न ही संगीतज्ञ।

मैं इससे प्रसन्न था। रात्रि के तीन प्रहर व्यतीत होने पर मैं साधारण देहातियों के-से वस्त्र पहन पैदल ही वृन्दावन की ओर चल पड़ा। सूर्योदय से दो घड़ी पश्चात् मैं गाँव में जा पहुँचा।

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