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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।

7

वृन्दावन बहुत ही छोटा-सा गाँव था। उसमें रहने वाले दूध, घी का व्यापार करते थे। लोग गायों को लेकर चराने के लिए दिन चढ़ते ही गाँव से निकल जाते थे। गायें वन में स्वेच्छा से विचरती थीं और उनके संरक्षक परस्पर खेलते-कूदते, कुश्ती लड़ते और गाते-नाचते थे।

ऐसी ही गायों के एक झुंड के साथ मैं भी चल पड़ा। मुझको साथ-साथ चलते देख एक ग्वाले ने पूछ लिया, ‘‘आर्य! किस ओर चले जा रहे हैं!’’

मेरा उत्तर था, ‘‘यमुना-तट को।’’

‘‘क्या काम है वहाँ पर?’’

‘‘दिन निकल आया है, स्नान करूँगा।’’

‘‘तो घाट पर क्यों नहीं जाते? इस ओर तो कोई अच्छा घाट मिलेगा नहीं।’’

‘‘अच्छा? तो कोई ऐसा स्थान बता दो जहाँ एकान्त भी हो, और वहाँ स्नानादि कर मैं संन्ध्या-उपासना कर सकूँ।’’

‘‘ब्राह्मण हैं आप?’’

‘‘हाँ।’’

इस पर एक ग्वाले ने कहा, ‘‘गाँव के घाट पर तो एकान्त मिलेगा नहीं। वहाँ स्त्रियाँ स्नान करती होंगी और कहीं परस्पर झगड़ पड़ी तो आपकी संन्ध्या-उपासना का घुटाला हो जायेगा।’’

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