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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘तो यहाँ स्त्रियाँ झगड़ा भी करती है?’’
‘तो क्या आपके देश में स्त्रियाँ नहीं झगड़ती?’’
‘‘हमारे देश में पुरुष झगड़ते हैं और स्त्रियाँ सन्धि कराती है।’’
इस पर अन्य ग्वाले हँसने लगे। मैं विस्मय में उनका मुख देखने लगा तो एक ने कहा, ‘‘पण्डितजी! पुरुष तो युद्ध करते हैं, झगड़ा नहीं करते। झगड़ा करना स्त्रियों की एक विशेषता है।’’
‘‘ओह!’’ मैंने उनकी बात को समझकर कहा, ‘‘तुम्हारा अर्थ गाली-गलौज से है क्या?’’
‘‘हाँ, पण्जितजी! स्त्रियाँ जब झगड़ती हैं तो बाप, दादा, पति, श्वसुर आदि सबकी गिनती कर डालती हैं। पर एक-दूसरे को हाथ नहीं लगाती। कही उनका यह झगड़ा आरम्भ हो जाए तो फिर दिनों-दिन तक चलता है। आप तो एकान्त चाहते हैं न? हमारे साथ आइये, हम आपको एक बहुत ही स्वच्छ स्थान बता देंगे।’’
मैं उनके साथ-साथ वन को चल पड़ा। चलते हुए मैंने पूछा, ‘‘यहाँ का राजा कौन है?’’
‘‘महाराज बृहत्बल।’’
‘‘कब से? यह स्थान तो मथुरा राज्य में था और वहाँ का राजा कंस है।’’
‘‘पाँच वर्ष हुए हमने राजा बदल लिया है।’’
‘‘क्यों? बृहत्बल में कौन विशेषता है जो कंस में नहीं मिली तुमको?’’
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