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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘भरत नगर के राजा बृहत्बल धर्मात्मा पुरुष है और कंस महापापी है।’’

‘‘क्या पाप किया है उसने?’’

मेरे इस प्रश्न पर सब मेरा मुख देखने लगे। कुछ विचार कर एक ने पूछ लिया, ‘‘आप कौन है? हमने आपको पहले कभी नहीं देखा।’’

‘‘मैं बहुत दूर से आया हूँ। मैंने व्रत लिया हुआ है कि भारत की सात नदियों में स्नान करूँगा। अभी तक मैंने दो नदियों में स्नान किया है। सिन्धु और गंगाजी का। आज यमुना नदी में स्नान कर गोदावरी की ओर चल पड़ूँगा। तत्पश्चात् कृष्णा और कावेरी में स्नान करूँगा। अन्त में बह्मपुत्र में स्नान कर अपने देश लौट जाऊँगा।’’

‘‘बहुत लम्बी यात्रा करेंगे?’’

‘‘हाँ, उद्देश्य भारत-भ्रमण है।’’

‘‘तो यह कैसे जानते हैं कि यह स्थान कंस के राज्य में था?’’

‘‘हमारे देश के एक ऐसी यात्रा किये हुए व्यक्ति ने बताया था। यों तो मथुरा में से होकर ही मैं आया हूँ। परन्तु उस यात्री ने बताया था कि स्नान का महात्म्य वृन्दावन में हैं। वृन्दावन की व्याख्या में उसने बताया था कि वह मथुरा के राजा कंस के राज्य में यमुना के बायें तट पर बसा है।’’

मेरी इस व्याख्या से वे ग्वाले सन्तुष्ट हो गये। उनमें से एक ने कहा, ‘‘कंस ने अपनी बहन और उसके पति को बन्दी बना रखा है।’’

‘‘क्यों? उसकी बहन ने क्या अपराध किया था?’’

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