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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘तब तो सन्देह की बात है ही ।’’
‘‘जो बात हमको समझ नहीं आई, वह है बन्दी-गृह से लड़के का बाहर लाया जाना। कंस के द्वारपाल इतने मूर्ख नहीं कि वे कंस की इच्छा के विपरीत कुछ भी होने दें।’’
इस समय हम यमुना के तट पर पहुँच गये थे। ग्वालों ने मुझको एक स्थान बताया, जहाँ जल निर्मल और कम गहरा था। मैंने वहाँ स्नान किया और बैठकर पूजा-पाठ करने लगा। ग्वाले अपनी गायों को चराने के लिए वन में भीतर ले गये।
पूजा-पाठ समाप्त कर मैं गाँव में चला गया। वहाँ नन्द का गृह पूछ उसके घर जा पहुँचा। गृह के बाहर एक हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति खाट पर बैठा तीन चार लोगों से, जो भूमि पर बैठे थे, बातचीत कर रहा था। मैं उसके सामने जाकर खड़ा हुआ तो उस खाट पर बैठे व्यक्ति ने प्रश्न भरी दृष्टि से मुझको देखा। मैंने उससे पूछ लिया, ‘‘मैं गाँव के मुखिया नन्द से मिलना चाहता हूँ।’’
‘‘मैं नन्द हूँ। कहो, क्या बात है?’’
मैंने कहा, ‘‘मैं नन्द से एकान्त में बात करना चाहता हूँ।’’
‘‘परन्तु तुम हो कौन?’’
‘‘इस गाँव में एक परदेशी हूँ। अपना परिचय भी एकान्त में दूँगा।’’
नन्द ने एक क्षण विचार किया और उठकर मुझसे बोला, ‘‘इधर आओ।’’
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