|
उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
|
137 पाठक हैं |
हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
वह मुझको साथ ले दूर एकान्त में चला गया। हम एक ऐसे स्थान पर आ पहुँचे थे, जहाँ से सौ-सौ गज के अन्तर पर न कोई वृक्ष था और न कोई व्यक्ति। यहाँ पहुँच उसने कहा, ‘‘अच्छा यह बताओ, तुम क्या जानना चाहते हो?’’
मैं उस व्यक्ति की चतुराई समझ गया। वह शरीर में मुझसे अधिक बलशाली था, अतः मुझ अकेले को सुगमता से पीट सकता था। वहाँ पर अन्य कोई मेरी सहायता के लिए आ भी नहीं सकता था।
मैंने कहा, ‘‘मैं हस्तिनापुर-महाराज धृतराष्ट्र की आज्ञा से यहाँ आया हूँ। हस्तिनापुर के कुरुराज, सम्राट, की पदवी पर आसीन हैं। यह मथुरा का राज्य और भरत-राज्य दोनों हस्तिनापुर के अधीन हैं। मथुरा के राजा ने महाराज धृतराष्ट्र को यह सूचना दी है कि बृहत्बल ने वृन्दावन और इसके साथ कई गाँव बलपूर्वक अपने अधीन कर लिये हैं। मैं इस विषय में जाँच करने आया हूँ?’’
‘‘क्या यह सत्य है कि महाराज बृहत्बल ने बलपूर्वक इस प्रदेश को अपने अधीन कर लिया है?’’
‘‘नहीं, यह सत्य नहीं है। इसने स्वयं ही महाराज बृहत्बल से प्रार्थना की थी कि हम उनके राज्य में रहना चाहते हैं।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘इसलिए कि मथुरा के राजा कंस हम पर अत्याचार कर रहे हैं।’’
‘‘परन्तु आपने राज्य तो उससे पूर्व ही छोड़ दिया था। उसने जो कुछ किया है, वह उसके पीछे किया है।’’
‘‘कंस एक क्रूर प्रकृति का पुरुष है। उसने अपनी बहन और उसके पति को बन्दी बनाया हुआ है और उनकी कोई सन्तान जीवित नहीं छोड़ता।’’
|
|||||

i 









