लोगों की राय

उपन्यास >> अवतरण

अवतरण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

137 पाठक हैं

हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘सुना तो मैंने भी है, परन्तु आपको इससे क्या?’’

‘‘इससे गाँव वालों को संदेह हो रहा है कि ऐसा दुष्ट राजा किसी दिन हम पर भी बरस सकता है।’’

‘‘परन्तु वह मथुरा वालों पर अथवा अपने अन्य किसी गाँव के लोगों पर तो ऐसा कर नहीं रहा। आपको उसके कोप का भय क्यों हो रहा है?’’

इस प्रकार जब नन्द वास्तविक बात बताने पर विवश हो गया तो कहने लगा, ‘‘यदि रहस्य की बात बताऊँ तो क्या आप उसको पेट में रख सकेंगे?’’

‘‘देखिये नन्दजी! मैं किसी भी बात का वचन नहीं दे सकता। हाँ, यदि आपके कर्म पापयुक्त नहीं हुए तो उन कर्मो के करने का आपको कोई दण्ड नहीं मिलेगा। उसको गुप्त रखूँगा। अथवा प्रकट करूँगा, यह तो कर्म की उपयोगिता के विचार से ही होगा।’’

इस पर नन्द गम्भीर विचार में पड़ गया। कुछ देक तक विचार कर उसने गर्दन सीधी की और छाती फलाकर कहा, ‘‘अच्छी बात है। मैं आपके व्यवहार को आपकी न्याय-बुद्धि पर छोड़ता हूँ। कंस की बहन देवकी ने गुर्जर प्रदेश के राजकुमार वसुदेव से कंस की इच्छा के विरुद्ध और उसको बताये बिना, विवाह किया तो कंस ने दोनों को बन्गीगृह में डाल दिया। वहाँ उनकी सन्तान को उत्पन्न होते ही मार डालता था। जब सात सन्तानें मारी जा चुकीं, तो वसुदेव ने बन्दीगृह के द्वारपालों की सहायता से षड्यन्त्र किया और अपनी आठवीं सन्तान को उत्पन्न होते ही हमारे पास पालने के लिए दे गया।

‘‘उसी रात मेरे घर में लड़की उत्पन्न हुई थी। मैंने उसके लड़के की रक्षा के निमित्त और कंस को तुरन्त इस रहस्य का पता न चल जाये इस कारण अपनी लड़की वसुदेव के लड़के के स्थान पर बन्दीगृह में ले जाने के लिए दे दी।’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book