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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘यह लड़की भी देवकी की सन्तान समझ कंस ने मार डाली। मुझे इस बात का भी भय था कि कंस इसका पता चलते ही हमारे गाँव पर आक्रमण कर इस लड़के को पकड़कर मरवा डालेगा। इस कारण मैंने अपने तथा अन्य गाँव वालों से मिलकर एक योजना बनाई। सब गाँवों की पंचायत बुलाकर निर्णय करा दिया कि हम इस क्रूर कंस के राज्य में नहीं रहेंगे और महाराज बृहत्बल से निवेदन करेंगे कि हमें अपने संरक्षण में ले लें। पंचायत का यह निर्णय लेकर मैं महाराज बृहत्बल से मिला और उनको पूर्ण परिस्थिति से अवगत कर अपना निवेदन रख दिया। महाराज ने हमारे प्रस्ताव को स्वीकार कर हमारी रक्षा के लिए सैनिक भेज दिये।
‘‘हमारा भय सत्य निकला। कंस ने कई बार यत्न किया कि वह इस लड़के को उड़ा ले जाये अथवा मरवा डाले। परन्तु हम उन सैनिकों की सहायता से इस लड़के की रक्षा करने में सफल हुए हैं।’’
‘‘क्या मैं उस लड़के को देख सकता हूँ?’’ मैंने उत्सुकतावश पूछा।
‘‘यदि आप इस कथा को सुनने के पश्चात् हमारे कर्त्तव्य को निन्दनीय समझते हैं अथवा दण्ड के योग्य समझते हैं, तो मैं उस लड़के को नहीं दिखाऊँगा, अन्यथा आप उस लड़के को देख सकेंगे।’’
‘‘मैं आपके कृत्य तो दण्डनीय नहीं समझता। इसके विपरीत आपका कार्य तो प्रशंसनीय है और पुरस्कृत किये जाने योग्य है।’’
‘‘तो आइये।’’ यह कह, नन्द मुझे अपने गृह में ले गया और भीतर पुकारने लगा, ‘‘कृष्ण! बेटा कृष्ण!!’’
इस पर लगभग पाँच वर्ष की आयु का एक बालक भीतर से भागता हुआ आ गया। वह बालक महा ओजस्वी और सुन्दर रूप-रेखा रखता है। कृष्णवर्ण का होने पर भी, यह अत्यन्त मनमोहक था। आगार के द्वार पर खड़ा मेरी ओर देख वह मुस्कराया, फिर भागकर मेरे समीप आकर खड़ा हो गया और मेरे मुख की ओर ध्यान से देखने लगा।
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