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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
मैं उसकी मुस्कराहट देख चकित रह गया। उस मुस्कराहट से मैं वास्तव में मन्त्र-मुग्ध हो उसकी ओर देख रहा था। वह कुछ देर तक मुझको देख नन्द से पूछने लगा, ‘‘बाबा! ये कौन है?’’
‘‘बेटा!’’ नन्द ने कहा, ‘‘ये महाराज धृतराष्ट्र के मन्त्री है। इनका नाम हैं सौमित्र!’’
‘नहीं बाबा!’’
‘‘क्या नहीं बेटा?’’
‘‘नहीं बाबा!’’ इतना कह वह हँस पड़ा और भीतर भाग गया।
इस पर नन्द भी हँसने लगा। हँसकर उसने कहा, ‘‘यह बालक मुझको बहुत ही प्यारा लगता है। इसकी रक्षा के लिए पूर्ण गाँव के लोग मेरी सहायता करते रहते हैं। सब इससे प्यार करते हैं।’’
मैंने देखा कि इस बालक में अवर्णनीय सम्मोहन है। उसको देख मुझे सुरराज का कथन स्मरण हो आया कि एक महान् शक्ति वृन्दावन में जा पहुँची है और वह कुरुवंश का समूल नाश करेगी। इतने प्यारे और कोमल बालक से उस विशाल और शक्तिशाली परिवार का कैसा नाश होगा, मैं समझ नहीं सका। इस पर भी एक बात को मानने में मुझे संकोच नहीं हुआ कि वह एक विशेष आत्मा है।
मैंने नन्द से कहा, ‘‘देखिये नन्दजी! आपका गाँव कंस को लौटाया नहीं जायेगा और यदि किसी समय भी कंस ने इस बालक की हत्या करने के लिए सेना इत्यादि भेजी तो उस सेना को पराजित करने में हम महाराज वृहत्बल को सहायता देंगे। वसुदेव की बहन पृथा का विवाह हमारे महाराज के कनिष्ठ भ्राता पांडु से हुआ था। अतः वसुदेव हमारे महाराज के सम्बन्धी हैं। उनकी सन्तान की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है। साथ ही यदि यह बात सत्य है कि वसुदेव कंस का बन्दी है, तो उसको छुड़ाने के लिए हमारे महाराज प्रयत्न करेंगे।’’
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