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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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मैं वृन्दावन से उसी सायंकाल लौट आया। जब राजप्रासाद में पहुँचा तो द्वारपाल ने मुझे रोक लिया। मेरे देहाती ढंग में वस्त्र देख उसने मुझे भीतर जाने नहीं दिया। इस पर मैंने कहा, ‘‘मुझको महाराज के समक्ष ले जाओ।’’
इस पर द्वारपाल का कहना था, ‘‘इस समय महाराज अन्तःपुर में हैं। वहाँ कोई नहीं जा सकता।’’
‘‘तो ऐसा करो, मैं एक पत्र देता हूँ; सेविकाओं द्वारा अन्तःपुर में उनके पास भेज दिया जाय।’’
द्वारपाल यह मान गया। मैंने अपना नाम तथा अपने आगारों में जाने की स्वीकृति की माँग लिखकर भेज दी। द्वारपाल ने मेरा नाम पढ़ा तो मुझको नमस्कार कर क्षमा-याचना करने लगा। उसने कहा, ‘‘आपको इन साधारण वस्त्रों को देख कौन आपको राजदूत समझेगा?’’
मैंने कहा, ‘‘कुछ हानि नहीं हुई। तुम लोग अपना कार्य इतनी सतर्कता से करते हो, तुमको पुरस्कार दिया जायेगा।’’
इस पर द्वारपाल ने कहा, ‘‘आज दिन-भर आपकी खोज होती रही है।’’
‘‘कौन खोज करता रहा है?’’
‘‘आपके गृह का सेवक। सूचना महाराज को भी दी जा चुकी है। महाराज भी चिन्तित थे। यदि आप इस पत्र पर लिख दें कि आप कहाँ थे और कब लौट आये हैं तो मैं महाराज को सूचित कर दूँगा।’’
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