लोगों की राय

उपन्यास >> अवतरण

अवतरण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

137 पाठक हैं

हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।

8

मैं वृन्दावन से उसी सायंकाल लौट आया। जब राजप्रासाद में पहुँचा तो द्वारपाल ने मुझे रोक लिया। मेरे देहाती ढंग में वस्त्र देख उसने मुझे भीतर जाने नहीं दिया। इस पर मैंने कहा, ‘‘मुझको महाराज के समक्ष ले जाओ।’’

इस पर द्वारपाल का कहना था, ‘‘इस समय महाराज अन्तःपुर में हैं। वहाँ कोई नहीं जा सकता।’’

‘‘तो ऐसा करो, मैं एक पत्र देता हूँ; सेविकाओं द्वारा अन्तःपुर में उनके पास भेज दिया जाय।’’

द्वारपाल यह मान गया। मैंने अपना नाम तथा अपने आगारों में जाने की स्वीकृति की माँग लिखकर भेज दी। द्वारपाल ने मेरा नाम पढ़ा तो मुझको नमस्कार कर क्षमा-याचना करने लगा। उसने कहा, ‘‘आपको इन साधारण वस्त्रों को देख कौन आपको राजदूत समझेगा?’’

मैंने कहा, ‘‘कुछ हानि नहीं हुई। तुम लोग अपना कार्य इतनी सतर्कता से करते हो, तुमको पुरस्कार दिया जायेगा।’’

इस पर द्वारपाल ने कहा, ‘‘आज दिन-भर आपकी खोज होती रही है।’’

‘‘कौन खोज करता रहा है?’’

‘‘आपके गृह का सेवक। सूचना महाराज को भी दी जा चुकी है। महाराज भी चिन्तित थे। यदि आप इस पत्र पर लिख दें कि आप कहाँ थे और कब लौट आये हैं तो मैं महाराज को सूचित कर दूँगा।’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book