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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘मैंने उस पत्र पर लिख दिया, ‘‘मैं वृन्दावन गाँव के लोगों के पास साधारण वस्त्रों में गया था और वहाँ से पूछताछ कर आया हूँ। कल मैं भरत-नगर जाने का विचार रखता हूँ।’’
इस सूचना को लिख द्वारपाल को दे मैं अपने प्रासाद में जा पहुँचा इसी समय वहां कंस आ पहुँचा। आते ही उसने पूछा, ‘‘यहाँ से कब गये थे आप?’’
‘‘मैं ब्राह्म-मुहूर्त से पहले ही निकल गया था। सब द्वारपाल सो रहे थे और किसी को भी मेरे जाने का पता नहीं चला।’’
‘‘हमने आपको राजसभा में ले चलने के लिए आमन्त्रित किया था। जब द्वारपाल आपको हमारा निमन्त्रण देने आया तो आपको लापता देख घबराया। पूर्ण मथुरा नगरी ढूँढ़ ली गई, परन्तु आप नहीं मिले और न ही किसी ने आपको बाहर जाते देखा था।’’
‘‘देखिए संजयजी!’’ कंस ने वहाँ आने का प्रयोजन बताते हुए कहा, ‘‘मैं चाहता हूँ कि आपको इतनी पूछताछ करने की आवश्यकता नहीं। आपको तो यह नीति निर्धारित करनी चाहिए कि पूर्ण भारत के राज्य, जो कुरुराज धृतराष्ट्र को अपना सम्राट् मानते हैं, परस्पर एक-दूसरे की प्रजा को भड़काने का कार्य न करें। यदि किसी एक की प्रजा किसी दूसरे के पास जाये तो प्रजा को अपने ही राजा के अधीन रहने की सम्मति दी जानी चाहिए। यदि इस प्रकार एक-दूसरे का राज्य छीनना आरम्भ हो गया तो यहाँ पर अव्यवस्था फैलेगी और युद्ध आरम्भ हो जायेगा, लोग दुःखी होंगे। देश में अकाल पड़ जायेगा और प्रजा भूखी मरने लगेगी।’’
‘‘वृन्दावन तथा इसके साथ वाले गाँव मुझको मिलने चाहिए।’’
‘‘यदि वृहत्बल अपने सैनिक वहाँ से हटा ले और फिर भी लोग आपके राज्य के अन्तर्गत न रहना चाहें तो फिर क्या होगा?’’
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