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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘उनको रहना पड़ेगा। कोई कारण नहीं कि वे मेरे राज्य में न रहें।’’

‘‘एक कारण उन्होंने बताया है। क्या आप वह कारण दूर कर सकते हैं?’’

‘‘क्या बताया है?’’

‘‘आपके बन्दीगृह में एक निरपराध पति-पत्नी बन्दी हैं। आप उन्हें छोड़ दीजिये।’’

‘‘यह एक राजा का कार्य है कि वह अपने राज्य में सुव्यवस्था बनाये रखने के लिए जिसको चाहे बन्दी-गृह में रखे। प्रजा इसमें कैसे हस्तक्षेप कर सकती है?’’

‘‘उनका कहना है कि वे निरपराध हैं। यदि यह सत्य है तो उनको यह भी अधिकार है कि एक अन्यायी राजा के राज्य से बाहर चले जायें।’’

‘‘तो चले जायें। मैंने उनको पकड़कर नहीं रखा।’’

‘‘वे चले गये हैं। अपने साथ अपने घर, अपनी भूमि और सब सामान भी ले गये हैं।’’

‘‘देखिये संजयजी! यह नहीं हो सकेगा। भूमि राजा की होती है, किसी व्यक्ति की निजी सम्पत्ति नहीं। अतः कोई भी व्यक्ति उसको उठाकर नहीं ले जा सकता।’’

‘‘यदि यह आपका अन्तिम निर्णय है तो फिर मैं महाराज धृतराष्ट्र से यहाँ की पूर्ण स्थिति बता दूँगा और जो कुछ उनकी आज्ञा होगी, वह आपके पास भेज दूँगा।’’

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