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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘मेरा यह अन्तिम निर्णय है कि मैं उन बन्दियों को नहीं छोड़ूँगा। मैं वृन्दावन पर भी अपना अधिकार वापस प्राप्त करने के लिए आक्रमण करूँगा।’’
‘‘तो ठीक है। मैं कल प्रातः हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान कर रहा हूँ। मेरे लिए अब यहाँ कोई कार्य शेष नहीं रहा।’’
कंस नाराज होकर वहाँ से चला गया। रात्रि को, भोजन कर मैं विश्राम की तैयारी कर रहा था कि द्वारपाल ने आकर बताया कोई मुझसे मिलने आया है।
मैंने नाम पूछा तो द्वारपाल ने कहा, ‘‘मैंने पूछा था श्रीमान्! उसने कहा है कि बताने की आवश्यकता नहीं।’’
मैंने कहा, ‘‘अच्छा, उसको बाहर बड़े आगार में बैठाओ। मैं आता हूँ।’’
बाहर जाकर मैंने देखा कि एक अति ओजस्वी व्यक्ति देहातियों के पहनावे में बैठा था। मेरे वहाँ पहुँचने पर उसने नमस्कार किया तो मैंने भी हाथ जोड़कर कहा, ‘‘बताइये! कैसे आना हुआ?’’
‘‘मैं इस ओर आया था कि आपके यहाँ होने का समाचार पा मिलने चला आया हूँ।’’
‘‘तो आप मुझसे पूर्व-परिचित हैं? मैंने आपको पहचाना नहीं।’’
‘‘मुझे पहचानने की आवश्यकता भी नहीं और पहचान सकते भी नहीं। मेरा यह वेश स्वाभाविक नहीं है। मैं चाहता हूँ कि मेरे यहाँ आने का किसी को पता न चले। इस कारण मैं वेश बदल कर आया हूँ। मुझको पता चला है कि आप कंस और बृहत्बल का झगड़ा निबटाने आये हैं।’’
‘‘यह सूचना आपको ठीक ही मिली है।’’
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