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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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इतना कह नारद मेरे आगार से निकल गया। उस रात मैं सो नहीं सका। दिन-भर की थकान होने पर भी मुझे नींद नहीं आई। मेरे मस्तिष्क में नारद की भविष्यवाणी गूँज रही थी। मैंने कह दिया था कि मैं उसकी बताई भविष्यवाणी को पूर्ण होने से रोकूँगा, परन्तु मेरा मन भीतर ही भीतर कहता था कि मेरे किये कुछ नहीं बनेगा। भीष्मजी ने मेरा कहा नहीं माना था। धृतराष्ट्र मेरा शिष्य होने से मेरे कथन की अवहेलना नहीं करता था, परन्तु महारानी गान्धारी और उसके भाई शकुनि की राय से जब दुर्योधन हठ करता था तो वात्सल्यता से विवश धृतराष्ट्र झुक जाता था।
मैं अपनी पूर्ण पूर्व-असफलताओं को स्मरण कर निराशा और चंचलता अनुभव करता था, परन्तु जब मैं यह विचार करता था कि संसार को अपने पथ पर चलने दूँ और स्वयं एक ओर हट जाऊँ तो मेरा मन ग्लानि से भर जाता जा। मेरा मन कहता था कि मेरा कर्त्तव्य यही है कि मैं स्वयं धर्म-पथ पर अग्रसर होऊँ तथा अपने आस-पड़ोस के लोगों को धर्म पथ पर चलने की प्रेरणा देता रहूँ। मुझ को इसमें सफलता मिलती है अथवा नहीं, यह देखना मेरा काम नहीं। मुझको तो कर्म करते हुए जीवन व्यतीत कर देना चाहिए।
उस रात्रि मैं सो नहीं सका। प्रातः स्नान, पूजा-पाठ आदि से निवृत्त हो, मैं कंस से मिलने उसके प्रासाद में जा पहुँचा। मैंने कंस से कहा, ‘‘मैं आज विदा होने वाला था, परन्तु अपने कार्य को पूर्ण करने के लिए मैं एक बार पुनः आपसे मिलने चला आया हूँ।’’
‘‘कल रात्रि एक देहाती ज्योतिषी मुझसे मिलने आया था और उसने आपके भविष्य के विषय में अत्यन्त निराशापूर्ण वक्तव्य दिया है। उसका कहना था कि वह आपसे भी मिलकर पूर्ण वृत्तान्त बता चुका है।’’
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